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हिंदी विभाग

 

 

 

 

 

 

भारत के विकास में महिलाओं का योगदान

लेखिका - कमला त्यागी

भारत की संस्कृति विश्व में सबसे समृद्ध संस्कृति है। इसीलिए भारतीय इतिहास, वेद,पुराण सभी स्त्री शक्ति की महिमा से भरे पड़े हैं। मॉं जीजाबाईहो या झॉंसी की रानी लक्ष्मीबाई इन तथ्यों का इतिहास साक्षी हैं। कोई भी कार्य शुरू करने से पहले शक्ति के रूप में मॉं दूर्गा,गायकी से पहले मॉं सरस्वती, शुभ कार्य से पहले लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है। यही नहीं हमारे देश में गंगा, गायत्री एवं गाय को भी माता का दर्जा दिया गया है।यह सब इसीलिए क्योंकि स्त्रियों का सम्मान करना हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। वेदों में मातृ देव भव, पितृ देव भव कहा गया है अर्थात माता-पिता को देवताओंकी श्रेणी में रखा गया है।हमारे शास्त्रों में स्त्री को पुरूष की अर्ध्दांगिनी माना गया हैं। जिस प्रकार पुरुष स्त्री के बिना अधूरा है। उसी प्रकार राष्ट्र भी स्त्री के बिना अधूरा है क्या हम श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्रीमती सुचेता क्रिपलानी, सरोजिनी नायडू आदि के योगदान को भूला सकते है।गांधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं को विशेष स्थान दिया। गांधी जी की प्रेरणा से महामया कमला नेहरु, सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा असफ अली जैसी विदुषी महिलाएँ भी इस आंदोलन में कूदी।
आज जब बराबरी का दर्जा दिए जाने की बात सभी राजनीति दल करते हैं लेकिन संसद में जब बिल पेशा होता है तो वही दल इसका विरोध करते हैं नव निर्वाचित संसद में जहॉं कुल सांसदों की संख्या ५४३ हैं दिनमें से महिलाओं की संख्या केवल ५८ है। आज स्थिति यह हैं कि कांग्रेस दल ने राष्ट्रपति, स्पीकर एवं दिल्ली की मुख्य मंत्री की कुर्सी महिलाओं को देकर कुछ हद तक महिलाओं का मान बढाया है। कांग्रेस सहित चार बडे राजनीतिक दल महिलाएँ चला रही हैं तब भी महिलाओं की उन्नति काफी पीछे हैं। ऐसे में महिलाओं को आगे बढाने के लिए यह आवश्यक हो जाता हैं कि उन्हें लोकसभा और विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व मिले।मेरा तो यह स्पष्ट मत है कि इसके पीछे भी पुरुषों की वही भावना छीपी है। वह अपने इन दावों के बावजूद स्त्री को अपने अधीन रखना चाहता है और उस पर शासन करने की भावना से वह छुटकारा नहीं पा रहा हैं।बदलते परिवेश में आज यह धु्रव सत्य बन गया है कि महिलाओं की आत्मरक्षा एवं सम्मान के लिए उन्हें पुरी स्वतंत्रता दी जानी ही चाहिए। लेकिन आज भी महिलाओं को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो होना चाहिए। हमारे यहॉं कुछ स्वार्थी तत्वों ने गोस्वामी तुलसीदास के इस कथन :"ढोल, गॅंवार, शुद्र, पशु,नारी ये सब ताडन के अधिकारी ' को ढाल बनाकर इस्तेमाल किया। तुलसीदास को गोस्वामी तुलसीदास बनाने का गौरव एक स्त्री-उनकी पत्नी व्दारा तिरस्कृत गोस्वामी तुलसीदास अंत तक अपने अपमान को नहीं भुला सके।गावों में पुरूष शराब पीकर स्त्री पर अत्याचार करते हैं। उन्हें मारते-पीटते हैं। आपने प्राय समाचार पत्रों में भी पढ़ा होगा वे यदि पुरूष के विरूद्ध शिकायत भी करती हैं तो पुलिस भी उन पर अत्याचार करती हैं। पुलिस हिरासत में उनका अपमान किया जाता है। झूठे आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद किया जाता हैं।आजकल ऐसी फिल्में प्रचलित है जिनमें स्त्रियों पर अत्याचार एवं बलात्कार के दृश्यों को बहुत भद्दे ढंग से दर्शाया जाता है। दिन पर दिन स्त्रियों के बदन पर कपड़े कम होते जा रहें हैं।ऐसे-ऐसे दृश्य दिशाएँ जाते हैं जिन्हें परिवार के साथ देखने में शर्म महसूस होती हैं। यदि महिलाओं को ऊपर उठाना है तो इन सब पर रोक लगाना परमावश्यक है।
हमारे देश में एक और महिलाओं के लिए अभिशाप है- दहेज। दहेज के लोभ में स्त्रियों को जलाने की घटनाएँ काफी बढती जा रही हैं। यह एक उन्नतिशील देश के लिए लज्जा की बात है।पुरातन काल से ही स्त्रियॉं अपमानित तथा प्रताड़ित की जाती रही हैं। देवी मॉं सीता को अग्नी परीक्षा लेने के पश्चात भी घर से निकाल दिया गया। भरी कौरव सभा में द्रौपदी का चीर हरण आज भी मस्तक को शरम से झुका देता है।हमारे यहॉं निगाह का पर्दा था। जब रावण सीता हरण करके ले गया तो मार्ग में सीता जी के आभूषण लक्ष्मण को दिखाते हुए पूछा भाई देखो यह सीता के हैं क्या? तो लक्ष्मण कहते हैं कि भैया मैं तो केवल पैरो के आभूषण ही पहचान सकता हूँ क्योंकि जब मैं प्रात चरण स्पर्श के लिए माता के पास जाता था तो बस पैर पर ही दृष्टि रखता हूँ, शरीर के किसी हिस्से पर नहीं।तो आइए हम सब मिलकर इस कार्य में यथायोग्य सहयोग देकर इसको सफल बनावें तभी हम मातृ ऋण से मुक्त हो सकते हैं।
यदि आप उपर्युक्त ये सहमत हैं तो मेरे साथ चलिए और यदि आप उपर्युक्त से असहमत हैं। तो मेरे पास आइए।


१४ सितम्बर : "हिन्दी दिन' के उपलक्ष्य में हिन्दी विशेषांकअतिथि सम्पादक : डॉ. केशव फालके, मुंबई

यह अंक "हिंदी दिवस' को पूर्णत: समर्पित है। हम महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई के संस्थापक सदस्य डॉ. केशव फालके के बहुत आभारी है, कि उन्होंने यह अंक पूर्णत: सम्पदित किया तथा अतिथि सम्पादक का उत्तरदायित्व सही तरहसे निभाया। महाराष्ट्र और मराठी भाषा का योगदान, हिन्दी के प्रति, सहा निष्ठावान रहा है। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। वह समृद्ध है और सशक्त भी ! - प्रधान संपादक

हिन्दी दिवस का ६० वॉं साल

हम इस वर्ष ६० वॉं "हिन्दी दिवस' मना रहे हैं। यद्यपि भारत की संविधान सभा ने १४ सितम्बर १९४९ को नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को भारत संध की "राजभाषा' के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी तथापि वास्तव में १९४५ से इस दिन को "हिन्दी दिवस' के रूप में मनाने का उपक्रम आरम्भ हुआ। १० और ११ नवम्बर १९५३ को काकासाहब न.वि. गाडगील की अध्यक्षता में नागपूर में "अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सम्मेलन' का पांचवॉं अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन में जब तक हिन्दी को अंग्रेजी के स्थान पर पूर्ण रूप से "राजभाषा' का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक १४ सितम्बर को "हिन्दी दिवस' के रूप में स्मरण करते रहने का विचार सामने आया। इस संदर्भ में औपचारिक रूप से पारित प्रस्ताव का मसौदा इस प्रकार था "यह सम्मेलन निश्चय करता है कि स्वतंत्र भारत के संविधान ने जिस दिन हिन्दी को राजभाषा तथा देवनागरी को राष्ट्रलिपी स्वीकार किया है, उस दिन अर्थात १४ सितम्बर को सम्पूर्ण भारत में "हिन्दी दिवस' मनाया जाय।' इसके प्रस्तावक थे श्री जेठालाल जोशी, अनुमोदक थीं श्रीमती मैना गाडगील और अन्य समर्थक- द्वय थे श्रीमती राधादेवी गोयनका और श्री. भा. ग. जोगलेकर। इसी प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मोहनलाल भट्ट ने दिनांक ३०-११-१९५३ को आगामी १४ सितम्बर १९५४ को "हिन्दी दिवस' के रूप में मनाने के लिए एक पत्र प्रान्तीय समितियों, जिला समितियों, नगर समितियों, देश के तमान हिन्दी से जुड़े कार्यालयों और विशिष्ट व्यक्तियों को भेजा। इस पत्र द्वारा आगामी १४ सितम्बर १९५४ को पहला "हिन्दी दिवस' के रूप में मनाने का विनम्र आग्रह किया गया। इस तरह १४ सितम्बर को सम्पूर्ण भारत में "प्रथम हिन्दी दिवस' के रूप में जोश-ख़रोश के साथ मनाया गया और तब से प्रतिवर्ष १४ सितम्बर "हिन्दी दिवस' के रूप में मनाने का सिलसिला जारी है। आखिर कब तक ? कत तक प्रतीक्षा की जायेगी हिन्दी के सम्पूर्ण राजभाषा बनने की ? यह यक्ष प्रश्न आज भी बाकी है। यही हिन्दी की शोकान्तिका है। कुटिल दुश्चक्र में फंसी है आज हिन्दी !
जाफर-जयचंदी चालें-
नब्बे के दशक में देश के अखबारों मे एक अति गोपनीय पत्र प्रकाशित किया गया था जिसमें "कान्वेंटों', द्वारा संचालित संस्थानों से शिक्षा प्राप्त शिष्यों से जो सरकारी उच्च पदों पर आसीन थे, से हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर युद्धस्तरीय प्राथमिकता से रोक लगवाने का अनुरोध किया गया था। इसका उद्देश्य स्वयंस्पष्ट था कि सरकारी नौकरियों मे भरती की परीक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्यत:, बनाए रखकर, भारतीय भाषाओं वालों को शासन में भाग लेने से वंचित रखा जाय। यह मात्र सत्ता पर कब्जा रखने को कुटिल जाफर-जयचंदी नीति के तहत ही किया गया था। बात उठी, तो दूर तक चली भी। आज तक सरकारी नौकरियों में महत्त्वपूर्ण पदों पर जमे हुए सत्ताधारी नौकरशाह नयी-नयी चाले चलकर हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अड़ंगे लगाते रहते हैं।इसी तरह इधर कुछ दिनों से अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनके मजमून के शीर्षक-उपशीर्षकों और विज्ञापनों में हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने-छापने का घिनौना अभियान चल पड़ा है। यह हिन्दी को भ्रष्ट करने की सुनियोजित साजिश के तहत चल रहा है जो अंग्रेजी को स्थापित करते रहने की चाल ही लगती है। आश्चर्य तो इस बात का है कि, इसके विरोध में अब तक इक्का-दुक्का प्रतिक्रियाएँ मात्र ही देखने-सुनने को मिली हैं। जबकि तत्काल हल्ला-बोल के जज़्बाती, विरोध की आवश्यकता है। अब तो पानी सिर से उपर गुजरने लगा है।
नया दौर : 

दिग्विजय के लिए निकली हिन्दीये तो हुई पुरानी बातें परन्तु अब नये दौर में विश्व भर में हिन्दी की लोकप्रियता निरन्तर बढ़ रही है। आठ विश्व हिन्दी सम्मेलनों ने विश्वभर में हिन्दी को नेत्रदीपक विस्तार दिया है। विभिन्न दृष्टिकोणों से विदेशी समुदाय भारत को बारीकी से जानने के लिए उत्सुक है। भारत की संस्कृति, भारत का आयुर्वेद, भारत का "योगा', भारत की नैसर्गिक सुषुमा, भारत की सूचना प्रौद्योगिकी सब कुछ विदेशियों के लिए आकर्षण के केंद्र बन गये है और वे, इस रहस्य को भी जान गये है कि इन सब से जुड़ने के लिए एक मात्र भाषा हिन्दी ही है। वैश्वीकरण और बाजारवाद के प्रभाव में विदेशी कम्पनियां भारत को उत्तम बाजार के रूप में देखने लगी हैं। यही कारण है कि अमेरिका, चीन, जपान जैसे विकसित और समृद्ध देश उनके यहॉं हिन्दी के अध्ययन- अध्यापन के लिए भरपूर बढावा देने लगे हैं। अकेले अमेरिका के १०० से अधिक प्रतिष्ठित विश्व विद्यालयों में शोध के स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कुछ दिनों पूर्व ही राष्ट्रपति बुश ने हिन्दी के विकास के लिए बड़ी राशी उपलब्ध कराई है जिसका, उपयोग शालेय स्तर पर हिन्दी के अध्यापन के लिए प्राथमिकता से किया जाएगा।इसी विश्वास के साथ आइये हम इस वर्ष का हिन्दी दिवस मनाएँ। इस हिन्दी दिवस विरोध मे ंहमने "हिन्दी की विकास यात्रा', "विश्व हिन्दी का स्वरूप' और "भारत में राजभाषा की दशा और दिशा'पर उपयुक्त जानकारी प्रस्तुत की है। आशा है यह सामग्री हिन्दी के प्रचार-प्रसार और समृद्धि में सहायक सिद्ध होगी। मेरे सहयोगी लेखक द्वय प्रा. अनंतराय त्रिपाठी और डॉ. आर. बी. सिंह के प्रति मै आभारी हूँ। इसी तरह साप्ताहिक नगर संकेत के प्रधान सम्पादक प्रा. जवाहर जी मुथा का भी हार्दिक आभारी हूँ जिन्होंने हिन्दी दिवस के अवसर पर मुझे अतिथि-सम्पादक होने का अवसर प्रदान किया। जय भारत,जिय हिन्दी । 

- डॉ. केशव फालके


 

लेखक : डॉ. रवीन्द्र प्रसाद सिंह "नाहर'
एम.ए.,एम.फिल.,पीएच.डी.,(जे.एन.यू.)
डिप्लोमा : अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद (मैक्सम्यूलर भवन, नई दिल्ली)पत्रकारिता प्रशिक्षण, नई दिल्ली
संप्रति : सहायक महा प्रबंधक (राजभाषा),
आईडीबीआई लिमिटेड (प्रधान कार्यालय, मुंबई)

 

राष्ट्रभाषा हिन्दी और राजभाषा हिन्दी में आयी हिन्दी यर्द्यापि एक समय हिन्दी भाषी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा थी लेकिन यह भी सही है कि यह पुनर्जागरण तथा स्वतंत्रता-प्राप्ति के पहले भी तीर्थों की भाषा रही, सधुक्कड़ी भाषा रही जो पूरे भारतवर्ष को विभिन्न भाषा-भाषी समुदाय के बीच स्थित तीर्थों के माध्यम से संपृक्त करती रही। हिन्दी भाषा के प्रयोग का यह क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। इसकी कई जनपदीय बोलियॉं साहित्यिक भाषा के रूप में विराजमान हैं। अवधी में तुलसी और जयसी, ब्रज में सूरदास और बिहारी, राजस्थान में मीरा और चन्द्र बरदाई, मैथिली में विद्यापति तथा हिन्दी की खड़ी बोली में भारतेन्दु, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, प्रेमचन्द आदि ने अपनी साहित्यिक रचनाएँ दी।हिन्दी-नामकरण के लिए आम तौर पर इस सिद्धान्त को सामने रखा जाता है कि सिन्ध नदी के आस-पास की जगह को सिन्धु कहा जाता है। ईरानी मे "स' का उच्चारण "ह' होता है, अत: "सिन्धु' का उच्चारण "सिन्दु' और फिर "हिन्दु' हो गया। धीरे-धीरे यह शब्द "हिन्द' हो गया। कालान्तर मे यह हिन्द शब्द पूरे भारत वर्ष के लिए प्रयुक्त होने लगा। समय परिवर्तन के साथ ही हिन्द से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु को "हिन्दी' कहा जाने लगा। परन्तु कालान्तर में "हिन्दी' शब्द एक भाषा विशेष तक ही सीमित हो गया। धीरे-धीरे समय बढता गया तथा उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक उर्दू, हिंदुस्तानी, रेखता आदि भाषाओं के लिए एक ही नाम-हिन्दी को माना गया। कालान्तर में धार्मिक व अंग्रेजों की राजनीतिक-कटूनीति के तहत संस्कृत मिश्रित भाषा का प्रयोग हिन्दी के रूप में तथा अरबी-फारसी मिश्रित भाषा का प्रयोग उर्दू के रूप में किया जाने लगा जिसे अलग-अलग लिपि में गढ़ते हुए एक ही भाषा के दो रूपों को हिन्दी और उर्दू अलग-अलग नाम दे दिए गए।यद्यपि हिन्दी भाषा का काल-विभाजन निश्चित तिथि से संभव नहीं है फिर भी साहित्यिक रचना के हिसाब से तथा उसे आधार मानकर इसे तीन कालों में विभक्त किया जाता है- आदिकाल, मध्यकाल तथा आधुनिक काल।सन् १००० ईसवी से १५०० ईसवी तक की हिन्दी भाषा के आदि काल में इससे पहले बोली जाने वाली प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं का प्रभाव इस पर अधिक दिखता है जिसे हम "पुरानी हिन्दी' भी कहते हैं। कालान्तर मेंे नाथों और सिद्धों ने पूरे भारत में इस भाषा के प्रचार-प्रसार में बहुत योगदान दिया जिसका श्रेय नाथ समुदाय के प्रवर्तक गुरू गोरखनाथ को जाता है तथा ८४ सिद्धों में से एक कण्हपा को कर्नाटक में इसके प्रचार-प्रसार का श्रेय जाता है। इस प्रकार हम यहॉं हिन्दी की राजभाषायी संभावनाओं को आसानी से पता लगा सकते हैं।सन् १५०० ईसवी से १८०० ईसवी तक की हिन्दी भाषा के मध्य काल तक आते-आते प्राकृत-अपभ्रंश से विकसित हिन्दी की कई बोलियॉं- ब्रजभाषा, अवधी आदि साहित्य का माध्यम बन गयी। यह मध्यकाल भक्ति-आन्दोलन का काल भी था जिसका ब्रजभाषा तथा अवधी के विकास में महनीय योगदान है। भक्ति-आन्दोलन का प्रभाव इस रूप में भी युगान्तकारी था कि ब्रजभूमि के बाहर भी ब्रजभाषा में रचनाएँ हुई। बंगाल में इसे "ब्रजबेलि' तथा असम में इसे "ब्रजावली' कहा जाता था। जहॉं सूरदास की रचनाओं में ब्रजभाषा का उत्कृष्ट रूप देखने को मिलता है वहीं तेलुगुभाषी वल्लभाचार्य, मराठी भाषी नामदेव तथा तुकाराम, गुजराती भाषा नरसी मेहता तथा प्राणनाथ आदि ने भी इस भाषा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। दक्षिण भारत के तंजावूर नगर में कृष्णभक्ति पर ब्रजभाषा में कई नाटकों की रचना हुई।रामभक्त कवियों में प्रमुख - तुलसीदास की मुख्य रचनाओं- "रामचरित मानस', "कवितावली' तथा "विनय पत्रिका' में भक्तिकाल की प्रमुख दूसरी भाषा अवधी का प्रयोग हुआ है। इस काल में ही अमीर खुसरो की पहेलियॉं, मुकरियॉं आदि खड़ी बोली में भी रची गई। साथ ही कबीर, गुरू नानक आदि की भाषा के साथ अरबी-फारसी के शब्दों के मिश्रण से हिन्दी का "सधुक्कड़ी' भाषा-रूप भी आगे बढा जो साधु-सन्तों, फकीरों आदि के माध्यम से पूरे भारतवर्ष में चारों दिशाओं में दूर-दूर तक फैला।हिन्दी का जो एक मिश्रित रूप विकसित हो रहा था उसी में राष्ट्रभाषा व फिर राजभाषा की अपार संभावनाएँ दीख रही थीं। यद्यपि मिश्रित भाषा के प्रयोग के कारण यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि गुरु नानक ने अपनी रचनाएँ पंजाबी में लिखी या हिन्दी में, मीरा ने राजस्थानी में लिखी या ब्रजभाषा में, विद्यापति ने मैथिली में लिखी या बॉंग्ला में। यच तो यह है कि इन सब का मिला-जुला नाम हिन्दी ही सटीक पाया गया। इस काल में दक्षिण भारत में भी "दक्खिनी हिन्दी' में कई रचनाएँ आईं। हिन्दी का यह रूप आज भी गोलकुण्डा, हैदराबाद, औरंगाबाद, गुलबर्गा बिजापुर आदि स्थानों में चलन में है।सन् १८०० ईसवी से आजतक के हिन्दी भाषा के इस काल अर्थात् आधुनिक काल में खड़ी बोली साहित्य की रचना का माध्यम बनने लगी। अब मद्य की भाषा के रूप में खड़ी बोली का विकास हुआ और जिसके साहित्यिक रूप के विकास का श्रेय भारतेन्दु हरिश्चंद्र को जाता है जिन्होंने हिन्दी के इस विकास को स्पष्ट रूप से कहा था कि अब "हिन्दी नयी चाल में ढली' है। हिन्दी के इस नयी चाल में ढलने में आजादी-वाणी भी मुखरित हो रही थी जो भविष्य में राष्ट्रभाषा व राजभाषा की संभावनाओं में दीख रही थी; क्योंकि नयी चाल में ढली हिन्दी ही है जिसमें आज सारा राष्ट्र, सारे राष्ट्र के केन्द्रीय कार्यालय लिख, पढ़ व बोल रहे हैं। ऐसे ही समय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली में गढ़ने व सॅंवरने में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने "सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक के रूप में रचनाओं को व्याकरण-दोष को सुधार कर छापा तथा एक स्पष्ट स्वरूप विकासित व निश्चित किया।हिन्दी भाषा की विकास-यात्रा में यह एक ऐसा काल था जब कविता में छायावादी धारा बहने लगी जिसने हिन्दी भाषा के साहित्यिक संस्कार को विकासित किया। छायावादी कवियों ने संस्कृत शब्दों का प्रयोग कर खड़ी बोली के रूप को सॅंवारने तथा निखारने का काम किया। इसी तरह अपने गद्य लेखन से रामचन्द्र शुक्ल, मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद जैसे कई साहित्यकारों ने हिन्दी को और भी परिमार्जित किया।राष्ट्रीय चेतना के स्वरयह वही काल था जब स्वतंत्रता-संग्राम का उफान ज़ोरों पर था। पूरे देशमें राष्ट्रीय चेतना की अनुगत्र्ज सुनायी पड़ रही थी। सामाजिक आन्दोलन, धार्मिक आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन तथा स्वातन्त्र्य आन्दोलन के माध्यम से जहॉं कई सुधार सामने आ रहे थे वहीं ब्रिटिशी हुकूमत के विरोध में असन्तोष उभर रहा था तथा राष्ट्रीय भावना का विकास हो रहा था जिससे समग्र एक नयी चेतना उत्पन्न हो रही थी। ऐसे ही समय पूरे देश में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता महसूस हो रही थी जो अखिल भारतीय स्तर पर परस्पर विचार-विनिमय, सम्पर्क व जनशिक्षा का माध्यम बन सके और यह गुण निश्चित रूप से हिन्दी में पाया गया। कालान्तर में हिन्दी के ये गुण राजभाषा की संभावनाएँ बनी जो पहले ही राष्ट्रभाषा के रूप में विराजमान हो गयी थी जिसे बंगाल के केशव चन्द्र सेन, महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक, गुजरात के स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा राष्ट्रपिता महात्मा गॉंधी आदि महापुरुषों ने प्रधानता दी थी व राष्ट्रभाषा के लिए उपयुक्त माना था। यही कारण है कि यह स्वतंत्रत्रा-संग्राम के काल में समूचे राष्ट्र की भाषा बनी जिसके माध्यम से राष्ट्रभक्तो ने, शाहिदों ने, तथा स्वतंत्रता-सेनानियों ने देश की जनता को प्रेरणा दी। अब तक यह भाषा साहित्य से आगे बढकर हिन्दी मुद्रण-व्यवस्था, हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार आदि से जन तक पहुँच गयी। तथा जनवानी बन गयी। हिन्दी भाषा की इस जनवानी में राजभाषा की अपार संभावनाएँ थीं जो कालक्रम में प्रस्फुटित हुई।अखिल भारतीय स्वरूप
हिन्दी की विकास-यात्रा में इसके स्वरूप तथा क्षेत्र पर ध्यान दें तो दो चीजों निखर कर सामने आती हैं- १. कि अब हिन्दी का स्वरूप निखर चुका था। २. कि अब इसके क्षेत्र का विस्तार हो चुका था। खडी बोली अब मानक हिन्दी के रूप में अपने सीमित क्षेत्र से निकलकर सम्पूर्ण भारत में फैल गयी थी और आज यह एक अखिल भारतीय रूप प्राप्त कर चूकी है। यह सार्वजनिक है कि हिन्दी विकास-यात्रा में संस्कृत तथा अरबी-फारसी एवं इसके आत्मसात करने के अपने गुण की अहम् भूमिका रही है और यही कारण है कि इसकी चार शैलियॉं उभर कर सामने आयी हैं- १. अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी, २. संस्कृतनिष्ठ हिन्दी, ३. सामान्य बोलचाल की हिन्दी, व ४. अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी जिसे "हिंग्रेजी' (हिंदी + अंग्रेजी) भी कहते हैं।विश्व भाषा हिन्दीराजभाषा की संभावनाएँ इसमें भी हैं कि जब हमारा देश वैश्विक क्षितिज पर छा रहा है, भूमण्डलीकरण का हिस्सा बन रहा है, "गैट' तथा विश्व बैंक से सम्बन्ध बनाये जा रहे हैं और जब ये सब राजनीतिक व प्रशासनीय स्तर पर हो रहे हैं तो जाहिर है नियमों के तहत राजभाषायी गतिविधियों का भी राष्ट्र स्तर पर अथवा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पालन होगा या होना चाहिए। यहॉं राजभाषा हिन्दी की अपार संभावनाएँ दिखती हैं।हिन्दी के साथ बढते बाजार की संभावनाएँ जुड़ी हुई हैं। अशोक वाजपेयी ने "जनसत्ता' (कोलकाता) के २४ अप्रैल २००५ के रविवारीय अंक में "कभी-कभार' स्तम्भ में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी थी जो इससे सम्बन्धित है- "पेंगुइन जैसे विश्वविख्यात प्रकाशक का हिंदी जगत् में आना इस मायने में तो ऐतिहासिक है कि सारे संसार में अब तक एक ही भाषा अंग्रेजी में प्रकाशन करने वाली इस संस्था ने पहली बार अंग्रेजीतर भाषाओं में प्रकाशन का निश्चय किया है और इस सिलसिले में संसार के संभवत: सबसे बड़े बहुभाषिक देश भारत को चुना है। यहॉं वे हिंदी से शुरू कर मराठी और मलयालम और तेलुगु में भी पुस्तकें प्रकाशित करने जा रहे हैं। हिंदी में पहला सेट पिछले सप्ताह एक पॉंच सितारा होटल में पेंगुइन के विश्वनियामक किन्हीं सज्जन ने जारी किया। जाहिर है कि ऐसा करते समय उनके दिमाग और ध्यान में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बढते बाजार की स्थिति और संभावनाएँ रही हैं।' हिन्दी के इस पहले सेट में तीन पुस्तकें (अनीता नायर तथा नमिता गोखले के दो अंग्रेजी उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद और खुशवंत सिंह की कुछ अंग्रेजी कहानियों का एक हिन्दी-अनुवाद-पुस्तक) तथा चौथी पुस्तक "हमारा हिस्सा' स्त्रियों को केन्द्र में रखकर लिखी कहानियों का अरुण प्रकाश द्वारा सम्पादित-संचयित मूल हिंदी-पुस्तक है। यद्यपि अशोक वाजपेयी ने हिन्दी में नये ढंग की मौलिक पुस्तकों की जरूरत, मॉंग तथा क्षमता पर पेंगुइन जैसी प्रतिष्ठित व भारी-भरकम संस्था को ध्यान देने कहा है न हि इस तरह की पुस्तकों के मात्र अनुवाद पर। सचमुच, हिन्दी की संभावनाएँ उसकी मौलिकता में होनी चाहिए।राजभाषा हिंदी की संभावनाएँ यहॉं भी दीख रही हैं कि अंग्रेजी शब्दकोशों में हिन्दी के नित्य-प्रायोगिक शब्द लगातार जुड़ते जा रहे हैं। हाल ही में धोती, साड़ी, झोपड़ी, राष्ट्रपति, संसद जैसे लगभग ६०० शब्द अंग्रेजी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में समाहित हो चूके हैं। देश के अधिकाधिक विश्वविद्यालयों में प्रयोजनमूलक हिन्दी के विभाग प्रारम्भ करके भी राजभाषा की संभावनाएँ और बढ सकती हैं।कार्यान्वयन में बाधाएँआचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने "भाषा, साहित्य और देश' पुस्तक के वर्ष" नामक निबंध में लिखा है, "हिन्दी सेवक की धारणा थी कि हिन्दी के राजभाषा स्वीकृत होने के साथ-ही-साथ हिन्दी अपनी गौरवमय स्थान तुरंत ग्रहण कर लेगी और उसका साहित्य देखते-देखते समृद्ध हो जाएगा, पर ऐसा हुआ नहीं। वास्तविकता की दुनिया में अप्रत्याशित बाधाएँ आ खड़ी हुई और अब भी नित्य नये रूप में प्रकट हो रही हैं। स्वभावत: हिन्दी के पुराने सेवकों के मन में झुंझलाहट पैदा होती है और कभी-कभी वे हताश भी देखे जाते हैं। एक बड़ी प्रतिक्रिया हुई है अँग्रेजी के पक्ष की दृढ़तापूर्वक स्थापना, दूसरी प्रतिक्रिया हुई है अनेक स्वीकृत-अस्वीकृत भाषाओं का सिर उठाना। अगर ध्यान से इस समस्या पर विचार किया जाए तो दोनों में से भी ऐसी नहीं है जिससे चिंतित या परेशान हुआ जाए। ये दोनों ही प्रतिक्रियाएँ प्रच्छन्न रूप से हिन्दी की शक्ति की स्वीकृति हैं। यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि हिन्दी का आन्दोलन "निज भाषा उन्नति' का आन्दोलन है। इसीलिए, देश के भिन्न-भिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषाएँ या बोलियॉं उन्नति करना चाहती हैं तो वे वस्तुत: हिन्दी को समृद्ध ही करेंगी। हिन्दी का आन्दोलन सदा से भारतीयकरण का आन्दोलन रहा हैं- स्वस्थ भारतीयकरण का अंग्रेजी के पक्ष में जोर देकर बोलने वाले जानते हैं कि वे हिन्दी को दबा नहीं सकेंगे और अंग्रेजी के स्थान पर किसी अन्य भारतीय भाषा को खड़ा करना उनके वश के बाहर की बात है। अन्य भारतीय भाषाओं की जितनी भी उन्नति होगी उतनी ही हिन्दी की समृद्धि होगी। इसलिए इन प्रतिक्रियाओं से विचलित होने का कोई कारण नहीं है। यह उसकी जाग्रत् और उदीयमान शक्ति का प्रमाण ही है। हिन्दी सबकी उन्नति का आनन्द और प्रेम की दृष्टि से देखती है।'समस्याएँ सब की होती हैं, राजभाषा हिन्दी की भी है। इन समस्याओं के समाधान के लिए भी मनीषियों ने समय-समय पर पग उठाये हैं। पारामारिबो (सूरीनाम) में सम्पन्न सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (५-९ जून, सन् २००३) में इस चिंता की और विशेष ध्यान दिया गया था तथा जिसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि "भारत में हिन्दी को जो संवैधानिक दुर्दशा हो रही है, उससे उसे मुक्त किया जाए। वहॉं प्रतिनिधि के रूप में गये भारत के बीस सांसदों द्वारा यह शपथ भी ली गयी थी कि भारत जाकर वे इस दुर्दशा को दूर करेंगे।'हाल ही में न्यूयॉर्क (अमेरिका) में सम्पन्न हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी इस समस्या पर कितना समाधान हुआ है ? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।प्रशासनिक दायित्व में शिथिलताराजभाषा पर राष्ट्रपति के आदेश के अब तक ६ खण्ड जारी हो चूके हैं। ७ वें खण्ड पर सुझाव आदि मॉंगे गए हैं। ८ वें खण्ड की प्रक्रिया अभी चल रही है। ध्यातव्य है कि राजभाषा पर सबसे शक्तिशाली निकाय "संसदीय राजभाषा समिति' अपनी संस्तुतियॉं राष्ट्रपति जी को प्रस्तुत करती है और राष्ट्रपति के अनुमोदन के पश्चात् ये "राष्ट्रपति के आदेश' कहलाते हैं जो देखा जाए तो भारत की सभी जनता के आदेश होते हैं अर्थात् लगभग सवा सौ करोड़ जनता के आदेश होते हैं। यदि कार्यालयों मे सवा सौ करोड़ जनता के आदेश का उल्लंघन हो रहा है या पूर्णरूपेण उसका कार्यान्वयन नहीं हो रहा है तो यह एक बृहत् प्रशासनिक समस्या तो है ही, साथ ही राष्ट्र की संप्रभुता की समस्या है जिसका समाधान सभी को, समस्त भारतवासी को करना होगा। जाहिर है जन-जागरण के साथ भाषा-जागरण भी करना होगा तभी राजभाषा की समस्या का समाधान की संभव हो पाएगा।राजभाषा हिन्दी की एक समस्या भारत सरकार द्वारा संचालित हिन्दी कथा-हिन्दी भाषा, हिन्दी टंकण तथा हिन्दी आशुलिपि में सरकारी कर्मचारियों को भेजने और उस पर अनुवर्ती कार्रवाई करने की है।भारत सरकार के राजभाषा विभाग की हिन्दी शिक्षण योजना के अत्नर्गत संचालित कक्षाओं को पूरा करने पर प्रथमद्रष्ट्या नौ फ़ायदे तो उन्हें तुरंत मिलते हैं जिन्हें हम नौ अभिहित कर सकते हैं- १. "हिन्दी-ज्ञान' बढ़ता है।, २. कक्षा-ज्ञान व सभी प्रशिक्षणार्थियों के क्रम में "काक्षिक-सामाजिक-सरोकार' बढ़ता है।, ३. "वाहन-प्रभार' मिलता है, ४. "प्रमाण पत्र' प्राप्त होता है।, ५. "नकद पुरस्कार' की प्राप्ति होती है।, ६. घर पर या यत्र-तत्र प्राइवेट रूप से कार्य करने पर "निजी अति-वेतन' मिलता है।, ७. ज्ञान-प्राप्ति पर कार्यालयी व हिन्दी पाखवाड़िक- "हिन्दी प्रतियोगिताओं में पुरस्कार' जीता जा सकता है।, ८. वार्षिक "प्रोत्साहन-पुरस्कार' प्राप्त कर सकते हैं।, ९. कार्यालय से "वेतन-वृद्धि' मिलती हैं। इन नौ सूत्री फ़ायदों को हम राजभाषा की इस समस्या के समाधान के रूप में देख सकते हैं। इसके लिए सभी सम्बन्धितों को बताने व समझाने तथा प्रशिक्षणार्थी को खुद भी समझने की जरूरत है।दिसम्बर, २००४ में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने तामिल नेता एवं संप्रत (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार के केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री टी.आर. बालू के राष्ट्रीय राजमार्गों पर हिन्दी में लिखे "किलोमीटर के पत्थर' लगाने की अनुमति देने के कदम पर ऐतराज जताया था जो कि गलत है। सच पूछा जाए तो श्री बालू ने भारत सरकार की राजभाषा नीति के तहत ही संवैधानिक कार्य व राष्ट्रीय कार्य किया था। जयललिता ने यह भी कहा था कि "राज्य में तमिल और अंग्रेजी के इस्तेमाल की द्विभाषा नीति का प्रयोग एन.एच.एन.आई. (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) दशकों से करता आ रहा है लेकिन अब अचानक उसने किलोमीटर प्रदर्शक हिन्दी में तैयार करने का निर्णय ले किया।'("सन्मार्ग', कोलकता, २२ दिसंबर २००४) सवाल यह उठता है कि गलत कार्य का तो उदाहरण नहीं दिया जा सकता। किलोमीटर प्रदर्शक हिन्दी में तैयार कर कोई गलत कार्य नहीं किया गया है।आज इस तरह की राजभाषायी समस्या के समाधान के लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी तथा छद्म-राजनीति को छोड़ते हुए हमें अपने में राष्ट्रप्रेम व राष्ट्रभक्ति भरनी होगी। हमें एक राष्ट्रभक्त की तरह राजभाषा हिन्दी की समस्याओं का समाधान खोजते हुए पूरे भारतवर्ष के क्रम में हिन्दी से नाता जोड़ना होगा जो कई मायनों में "लाभकारी' भी है।


 

लेखक : प्रो. अनन्तराम त्रिपाठीप्रधान मंत्री : राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा, महाराष्ट्र - ४४२००३

 

हिन्दी, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा है। स्वाभाविक है कि हम भारतीयों के मन में यह बात उठे कि हिन्दी को विश्वभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कि संयुक्त राष्ट्र में इसे अधिकारिक भाषा की मान्यता प्राप्त हो।अब तक संयुक्त राष्ट्र में छह अधिकारिक भाषाएँ स्वीकृत हैं- अंग्रेजी, रूसी, चीनी, स्पेनिश, फ्रेंच तथा अरबीसन् १९४५ में संयुक्त राष्ट्र संघ में पॉंच आधिकारिक भाषाएँ मान्य की गई थीं- अंग्रेजी, रूसी, चीनी, स्पेनिश तथा फ्रेंच। चूँकि अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र संघ के जन्म से ही उससे जुड़े थे अत: अंग्रेजी और रूसी को आधिकारिक भाषा का स्थान मिलना ही थी। चीनी (मंडारिन) विश्व की तत्कालीन सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषा थी अत: उसे स्वीकार किया गया। स्पेनिश यूरोप की एक सशक्त भाषा थी तथा साम्राज्यवादी शासकों की भाषा का रुतबा रखती थी। मेक्सिको, मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका के देशों में स्पेनिश का वर्चस्व रहा। उसी प्रकार फ्रेंच भी यूरोप की एक प्रभावशाली तथा अपेक्षाकृत बहुसंख्यकों द्वारा बोली जानेवाली भाषा थी। वह कनाडा, मध्य अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका एवं उत्तरी पश्चिम अफ्रीका के अनेक देशों में छाई हुई थी। आज भी ये भाषाएँ इन क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित हैं। परिणामस्वरूप स्पेनिश तथा फ्रेंच भी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनी। इसके बाद के ढाई दशक राजनीतिक एवं आर्थिक दृष्टि के काफी हलचल भरे रहे। प्राकृतिक तेल एवं गैस ने ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इनके कारण खाड़ी के अरब देश एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरे। परिणामकारक १९७३ में अरबी भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनी। इन छह भाषाओं को सुरक्षा परिषद में भी स्थान मिला।इस तरह हम देखते हैं कि अपनी साम्राज्यवादी शक्ति सबसे अधिक संख्या में बोली जाने एवं धन बल के कारण उपर्युक्त छह भाषाएँ संयुक्त राष्ट्र संघ एवं सुरक्षा परिषद में स्थान पा गई।अब हमें हिन्दी की स्थिति पर विचार करना है। हिन्दी तीव्र गति से विकासमान भारत की राजभाषा है। बोलनेवालों की संख्या के आधार पर आज हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली व समझी जानेवाली भाषा है। डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने भाषा शोध अध्ययन-२००७ के हवाले से लिखा है कि विश्व में हिन्दी जाननेवालों की संख्या एक अरब दो करोड़ चौंतीस लाख (१,०२,३४,००,०००) है जब चीनी जाननेवालों की संख्या विश्व में केवल छानवे करोड़ (९६,००,००,०००) है। भारत में हिन्दी बोलने और समझनेवाले अस्सी करोड़ अस्सी लाख (८०,८०,००,०००) लोग हैं। विश्व के अधिकांश देशों में इस भाषा के जाननेवाले बड़ी संख्या में हैं। इस तरह संख्या की दृष्टि से भी हिन्दी भाषा विश्व में प्रथम स्थान पर है। सम्भवत: इसी कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डब्ल्यू. जार्ज बुश ने अपने देशवासियों से देश की सुरक्षा और समृद्धि के लिए हिन्दी सीखने की अपील की है। इतनी बड़ी संख्या द्वारा बोली और समझी जानेवाली भाषा की उपेक्षा किसी भी तरह उचित नहीं है। विश्व शान्ति, विश्व बंधुत्व, सौहार्द्य एवं विश्व मैत्री को मजबूत बनाने के लिए हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा के रूप में यथाशीघ्र स्वीकृति मिलनी चाहिए।हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा बनाने की मॉंग सर्वप्रथम १९७५ में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी साहित्य सम्मेलन में विश्वभर से आए हिन्दी प्रेमी विद्वानों द्वारा सर्वसम्मति से परित मन्तव्य द्वारा की गई थी जिसकी पुष्टि अब तक आयोजित सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में की गई। न्यूयार्क में १३ जुलाई २००७ को आयोजित आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र के सभा भवन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान-की-मून ने अपने भाषण में कुछ वाक्य हिन्दी में बोलकर हिन्दी के पक्ष में एक वातावरण का निर्माण किया। डॉ. मून ने कहा कि हिन्दी दुनिया भर के लोगों को पास लाने का काम कर रही है। यह दुनिया भर की संस्कृतियों के बीच एक पुल का काम कर रही है।यह पहला अवसर था कि संयुक्त राष्ट्र का कोई महासचिव पहली बार विश्व हिन्दी सम्मेलन को संबोधित करते हुए हिन्दी भाषा की प्रशंसा कर रहा था।उस समय मंच पर भारतीय प्रतिनिधी-मण्डल के नेता विदेश राज्य मंत्री श्री आनन्द शर्मा, अमेरिका में भारत के राजदूत श्री रनेन्द्र सेन, संयुक्त राष्ट्र मेंे भारत के स्थायी प्रतिनिधि श्री निरुपम सेन, मारीशस के शिक्षा और मानव संसाधन विकास मंत्री श्री धरमवीर गोखुल, नेपाल के उद्योग-वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्री श्री राजेन्द्र महतो एवं भारतीय विद्या भवन, न्यूयार्क के अध्यक्ष डॉ. नवीन मेहता विराजमान थे। उद्घाटन के अवसर पर भारत के प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के विडियो संदेश को परदे पर दिखाया गया। संदेश था-सन् १९७५ में नागपूर से शुरू हुई हिन्दी की विश्व यात्रा आज आठवें विश्व सम्मेलन के रूप में अपनी एक खास मंजिल तक आ पहुँची है। यह सफर दिलचस्प एवं रोमांच भरा रहा है। पोर्ट लुइस से होते हुए नई दिल्ली, पोर्ट ऑफ स्पेन, लंदन, पारामारिबो से गुजरता हुआ ये कारवॉं आज न्यूयार्क आ पहुँचा है।अमेरिका में रहे ८ वें सम्मेलन की एक खास अहमियत है। आज अमेरिका दुनिया के विकसित देशों में सबसे आगे है। हमारे दोनों देशों की जनता और सरकारों के बीच दोस्ताना रिश्ते हैं। अमेरिका में बसे भारतीय लोगों ने इस देश के हर क्षेत्र में अपनी एक पहचान बनायी है। चाहे वह विज्ञान हो या तकनीकी क्षेत्र, आर्थिक या शिक्षा, साहित्य या संस्कृति, कोई भी क्षेत्र हो भारतीयों के योगदान से सभी परिचित हैं। मुझे यकीन है कि आनेवाले दिनों में भारत और अमेरिका के रिश्ते और भी मजबूत बनेंगे।आज हिन्दी विश्व भाषा बन चूकी है। आँकडे यह बताते हैं कि दुनिया की सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषाओं में हिन्दी दूसरे स्थान पर है। दुनिया के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई हो रही है। आज अमेरिका में भी हिन्दी की पढ़ाई का ख्याल किया जा रहा है। अनेक हिन्दी संस्थाएँ बच्चों को शनिवार और रविवार के दिन हिन्दी पढ़ाती हैं। कुछ अमरीकी स्कूलों में सिलेबस में भी हिन्दी ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है, जो कि शुभ-संकेत है।भारत से बाहर देशों में हिन्दी भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए भी भारत सरकार अपनी ओरसे बहुत कोशिश कर रही है। इसी मक़सद से समय-समय पर विश्व हिन्दी सम्मेलनों में पास किए गए प्रस्तावों पर अमल किया जाता रहा है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मारिशस में एक विश्व हिन्दी सचिवालय बनाया गया है। इस सचिवालय को पूरी तरह सक्षम बनाने के लिए भारत और मॉरिशस दोनों देशों की सरकारें मिलकर काम कर रही हैं। सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पास प्रस्तावों में से एक यह भी था कि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में एक अधिकारिक भाषा बनायी जाए। हम उस दिशा में भी कार्य कर रहे हैं। इस सम्मेलन में पास प्रस्तावों पर भी तेज से कार्यवाही की जाएगी।मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि आज हिन्दी को दुनिया भर में तेजी से फैलाने में सूचना प्रौद्योगिकी ने भूमिका निभायी है। आज हिन्दी का ज्यादातर साहित्य चाहे व प्रेमचंद की कहानी हो या सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता, हमें घर बैठे इंटरनेट पर पढने को मिल जाती है। इंटरनेट पर हिन्दी के अखबार, पत्रिकाएँ वेबसाइट ब्लोग्स देखे जा सकते हैं।किसी देश की तरक्की उसकी भाषा से जुड़ी होती है। आज हिन्दी का बढता विस्तार हमारे देश के विकास में साफ दिखाई दे रहा है। यक़ीनन् सारी दुनिया में हिन्दी को बढावा मिल रहा है। यह हिन्दुस्तानियों की मेहनत और लगन की मिसाल है। यही वजह है कि भाषा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, दर्शन, साहित्य, विचार, परंपरा, संगीत, सिनेमा, खान-पान की ओर भी दुनिया खिंची चली आ रही है।इस मौके पर मैं कुछ सुझाव भी देना चाहता हूँ। इससे विश्व भाषा हिन्दी का सम्मान और भी बढेगा। हमें बाहर बसे अनिवासी भारतीय लेखकों का हिन्दी साहित्य भी पाठ्यक्रम में लेना होगा। दुनिया के अनेक देशों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। ऐसे देशों के लिए मानक पुस्तकें बनानी होंगी। हिन्दी को इंटरनेट की ताकतवर भाषा बनाने के लिए अच्छे हिन्दी सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर एवं सर्च इंजन बनाने होंगे।जय हिन्द - जय हिन्दी।उद्घाटन समारोह के बाद उसी स्थान पर शैक्षिक सत्र-१ की शुरूवात हुई जिसकी अध्यक्षता भारत की राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. गिरिजा व्यास ने की । इसका विषय था - संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दीइन पंक्तियों के लेखक ने अपने बीज व्याख्यान में उन कारणों पर प्रकाश डाला जिससे कि आज छह भाषाएँ संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता प्राप्त भाषाएँ बन पाई है। श्री त्रिपाठी ने जोर देकर कहा कि वे सभ कारण आज हिन्दी के पक्ष में मौजूद हैं। दुनिया में सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थान मिलना ही चाहिए। भारत सरकार को इसके लिए अब कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए, इसका सुझाव श्री त्रिपाठी ने अपने व्याख्यान में दिया।प्रो. रामशरण जोशी ने कहा कि "संयुक्त राष्ट्र हिन्दी' और "विश्व मंच पर हिन्दी' को अधिष्ठित करने का यह अनुष्ठान अर्थात् विश्व हिन्दी सम्मेलन सम्पूर्ण राष्ट्र की भावना एवं संकल्प का प्रतिनिधित्व करता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक राष्ट्र है और हिन्दी इसके अधिसंख्य लोगों की भाषा है। अत: हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित और संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता देकर विश्व समुदाय भविष्य में इस विश्व पंचायत तथा लोकतंत्र को और अधिक सुदृढ़ व सुरक्षित कर सकता है।श्री रत्नाकर पाण्डेय ने कहा कि, हमें मिशनरी स्तर पर कार्य करना है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए संकल्प लेना चाहिए। यह संकल्प यहॉं से मीड़िया और पत्रकारों को लेकर जाना चाहिए। अब जब कि हम लोक संयुक्त राष्ट्र के सभा भवन में आज हिन्दी में बोल रहे हैं, हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा तो बन ही गई।यू.एस.ए. के प्रोफेसर हरमन वैन ऑल्फन, चीन के प्रोफेसर जियांग जिंग कुई तथा मारीशस के विश्व हिन्दी सचिवालय की महानिदेशक डॉ. विनोद बाला अरुण ने भी जोर देकर कहा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की भाषा हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा का स्थान मिलना ही चाहिए और देरसबेर उसे वह स्थान मिलेगा ही।भारत सरकार के विदेश राज्य मंत्री श्री आनन्द शर्मा ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की सिफ़ारिशों पर सरकार समुचित कार्यवाही करेगी। उन्होंने कहा कि भारत सरकार दुनियाभर के हिन्दी प्रेतियों के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र में अधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता दिलाने के लिए एक विश्वव्यापी अभियान चलाएगी। सितम्बर, २००७ में होनेवाली संयुक्त राष्ट्र की बैठक के पहले यहॉं सम्मेलन का आयोजन किया जाना इस दिशा में एक पहल है।विदेश राज्यमंत्री ने कहा कि भारत की ओरसे संयुक्त राष्ट्र में इस सम्बन्ध में अधिकारिक प्रस्ताव पेश करने से पहले अभी कई औपचारिकताएँ पूरी की जानी है। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि सरकार इसके लिए धन की कमी नहीं होने देगी। उन्होंने आयोजन में हुई कुछ असुविधाओं के लिए खेद जताया। उन्होंने घोषणा की कि सम्मेलन के बाद भी विदेश मंत्रालय का हिन्दी विभाग लगातार सक्रिय रहेगा।कुछ मिलाकर संयुक्त राष्ट्र संघ का सभा भवन १३ जुलाई २००७ को हिन्दीमय हो गया था। संभवत: यह पहला अवसर था जब कि इतने बड़े पैमाने पर वहॉं की पूरी कार्यवाही हिन्दी के लिए और हिन्दी में हुई।इसके लिए उठाए जानेवाले कदम-
१. भारत सरकार की औरसे संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी को अधिकाधिक भाषा बनाए जाने के लिए औपचारिक रूप से प्रस्ताव रखा जाना चाहिए। इस प्रस्ताव पर अधिक से अधिक सदस्य देशों का अनुमोदन करते हुए हस्ताक्षर होना चाहिए।२. सदस्य देशों के शासनाध्यक्षों, विदेश मंत्रियों तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ में उनके प्रतिनिधियां से मिलकर इस प्रस्ताव के पक्ष में अनुकूल वातावरण तैयार करना चाहिए। इसके लिए विभिन्न देशों में हिन्दी के पक्ष में अपना तर्क रखनेवाले प्रतिनिधियों का शिष्टमंडल भेजा जाना चाहिए जो कि विभिन्न देशों की सरकारों का समर्थन जुटा सकें। इससे संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी की स्वीकृति के लिए रखे जानेवाले प्रस्ताव को समर्थन एवं बहुमत मिलेगा। यह भी हो सकता है कि यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो जाय।३. संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा बनाने के लिए जनरल असेम्बली के सभाभवन में कुछ ढॉंचागत आवश्यक परिवर्तन भी करने पड़ेंगे। बिजली, सॉफ्टवेयर तथा ध्वनि प्रक्षेपण आदि उपकरणों के लिए भी व्यवस्था करनी पड़ेगी। अनुवादकों, दुभाषियों की टीम तैयार करनी होगी। इन पर होनेवाले सही खर्च की जानकारी प्राप्त करके आवश्यक धनराशि मुहैया करानी होगी। यह राशि एक-डेढ अरब अथवा उससे ज्यादा भी हो सकती है। किन्तु अपनी अस्मिता, अपने स्वाभिमान एवं राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए दृढ संकल्प के साथ यह राशि खर्च करने की जिम्मेदारी भारत सरकार को उठानी चाहिए।४. अचानक कुछ अप्रत्याशित अड़चनें भी आ सकती हैं- उनका समाधान हमारी सरकार निकाल लेगी- ऐसा विश्वास है।हमारे प्रधान मंत्री, विदेश मंत्री, एवं विदेश राज्य मंत्री यदि संकल्प के साथ इन तमाम सुझावों पर ध्यान देते हुए अपने वायदों को पूरा करने का प्रयास करते हैं तो संयुक्त राष्ट्र के सभा भवन में आयोजित यह विश्व हिन्दी सम्मेलन सार्थक माना जायगा और हमारी सरकार की ओर से रखा गया हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ में निश्चित रूप से स्वीकृत किया जाएगा।


 

भारतीय साहित्य में विशेषकर भक्ति साहित्य में रहस्यवाद की सुदृढ़ परंपरा मिलती है। हिंदी भक्ति साहित्य में तो रहस्यवाद अपने चरम पर है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, सिद्धों, जैन मुनियों, नाथ पंथियों के साहित्य और हिंदी भक्ति साहित्य के सगुण और निर्गुण भक्तों-संतों ने रहस्यवाद की परंपरा को सतत् आगे बढाने का काम किया है।रहस्यवाद का आधार है- अव्यक्त अज्ञात। भक्त का आधार है- ज्ञात और व्यक्त, अर्थात अव्यक्त को व्यक्त ही रखकर भक्त अराधना नहीं कर सकता। अव्यक्त ब्रह्म को अवतार लेना पड़ता है और तब भक्त उस मानवीय अभिनय करने वाले किंतु तत्त्वत: ब्रह्म से अपना संबंध जोड़कर उससे भक्ति की याचना करता है, उसके गुण, कीर्तन, पद-सेवा, पूजा, अर्चना और जप आदि में मग्न रहाता है। तुलसी व सूर आदि ऐसे ही भक्त थे। एक व्यापक दृष्टिकोण से इन्हें भी रहस्य-वादी कह दिया जाता है लेकिन रहस्यवादी वही है जो अव्यक्त से सीधा संबंध जोड़कर आत्मा की वीरह-मिलन की स्थिति का चित्रण करे। अत: भक्तिकाल के कवियों को कबीर, जायसी आदि से अलग श्रेणी में रखा जाता है। उपासना के क्षेत्र में ब्रह्म निराकार नहीं रह सकता। उसमें गुणों का आरोप करना ही पड़ता है। अत: निगुर्ण से जब ब्रह्म सगुण हो जाता है तभी व्यक्ति रहस्यवादी से साधक भक्त बन जाता है।रहस्यवादी कवियों की कई श्रेणियॉं हैं। परंतु एक ही रहस्यवाद में विभिन्न प्रवृत्तियॉं मिलती हैं। उदाहरणार्थ-(क) ज्ञान और दार्शनिकता : प्रधान रहस्यवादी- कबीर, दादू, निराला आदि।(ख) साधनात्मक रहस्यवादी : तांत्रिकों, सिद्धों, शाक्तों, कबीर तथा गोरख को इसमें रख सकते हैं।(ग) प्रणय मूलक सहस्यवादी : मीरा, कबीर, प्रसाद, महादेवी, निराला।वे कवि जो मुख्यतया सहस्यवादी नहीं हैं तो भी उनमें एक विशेष प्रकार का सहस्यवाद मिलता है, तथा-(क) भक्ति प्रधान- तुलसी, गुप्तजी आदि।(ख) प्रकृति मूलक- सुमित्रानंदन पंतइनमें निराला में प्रणय मूलक रहस्यवाद के साथ चिंतन-प्रधान रहस्यवाद अधिक मिलता है। "गीतिका' के गीत इसके प्रमाण हैं।साहित्य के क्षेत्र में रहस्यवाद की प्रवृत्ति भी वस्तुत: आत्मा-परमात्मा-मिलन के महाप्रयास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। जब मनुष्य अपनी अंत:स्फुरित अपरोक्ष अनुभूति द्वारा सत्य, परम तत्त्व अथवा ईश्वर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने को प्रवृत्त होता है तो उसकी इस क्रिया को रहस्यवाद नाम दिया जाता है। इस संबंध में विद्वानों का कथन है कि यह (अर्थात रहस्यवादी) प्रवृत्ति मनुष्य की प्रकृति का एह अविभाज्य अंग रही है और रहस्यानुभूति संभवत: मनुष्य की श्रेष्ठतम एवं उदात्ततम अनुभूति है। इसकी अभिव्यक्ति सभ्यता के प्राय: सभी स्तरों, देशों और कालों में होती रही है। रहस्यवाद उतना ही पुरातन है जितनी मानवता। उसकी मर्मानुभूति की असीमता और चिरंतनता देश काल से परे है।परमात्मा की प्राप्ति के लिए साधकों ने अपने-अपने ढंग से साधना के पुष्प अर्पित किए हैं। परमात्मा की प्राप्ति के लिये साधना के दो मार्ग ही श्रेयस्कर बतायें गए है-जाते समरसानन्दे द्वैतमप्यमृतोपम्।मित्रयोरिव दम्पत्योर्जीवात्म परमात्मन:।।अर्थात आत्मा-परमात्मा की समरसता की उदात्त स्थिति की प्राप्ति सख्यभाव या दांपत्य भाव से ही हो सकती है। वस्तुत: ईश्वर प्राप्ति के इन दो प्रकार के सभी भावों का एकमात्र उद्देश्य द्वैत की स्थिति को समाप्त करके अद्वैत की स्थिति की प्रतिष्ठा करना है। सभी भक्ति पद्धतियॉं साधक और साध्य के मध्य की दूरी को पाटने के लिए प्रकाश में आई हैं। निःसंदेह अन्य भक्ति पद्धतियों की तुलना में सख्य भाव तथा दांपत्य भाव की भक्ति में भक्त और भगवान के बीच अपेक्षतया बहुत कम दूरी रह जाती है। सख्यभाव में तो यह दूसरी किंचित् मात्रा में बनी रहती है किंतु दांपत्य अथवा माधुर्य भाव मं भक्त और भगवान एकाकार हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण यह है कि सखा से तो फिर भी किंचित् संकोच और लाज की स्थिति रह सकती है किंतु प्रिया और प्रियतम के मध्य तो सब कुछ क्षम्य है। यहॉं संकोच और लज्जा के आवरण नहीं रहते। केवल प्रेम का उन्मुख विलास होता है, सर्वत्र प्रेम ही प्रेम का कंचन बिखरा होता है।मीरा की भक्ति माधुर्य भाव की है। यही कारण है कि उनके और प्रियतम श्रीकृष्ण के बीच कोई भी दुराव अथवा छिपाव नहीं हैं। ऐसे एकनिष्ठ प्रेम में कुछ भी अदेय नहीं रह जाता। हिंदी साहित्य में रहस्यवाद का चरम विकास सूफ़ी कवि जायसी में देखा जा सकता है, लेकिन प्रेमानुभूति की गहराई की दृष्टि से मीराबाई सूफ़ी कवि जायसी की अपेक्षा अधिक सफल कही जा सकती हैं क्योंकि मीरा एक अल्हड़ प्रेमिका है और जायसी मूलत: एक कवि। भले ही मीरा की प्रेमानुभूति जायसी की भॉंति व्यापक न हो लेकिन हृदय को छू देने की क्षमता लिए मीराबाई अद्वितीय है। मीरा तो अपने प्रियतम के प्रेम में पूर्णत: पगी हुई हैं, उनके प्राण तो अपने प्राणेश्वर के साथ रमण ही करते हैं। प्रेमिका और प्रियतम के मध्य तनिक भी दूरी नहीं रही है। मीरा के निम्नलिखित पद में यही अद्वैत भाव देखा जा सकता है-पिया अब आज्यौ मेरे तुम मोरे हूँ तोरे।मैं जण तेरा पंथ निहारूँ, मारण चितवत तोरे।अवध बढीती अजहूँ न आये, दुतियन सु नेह जोरे।मीरा कहे प्रभु कब रे मिलोगे दरसण बिण दिन ढोरे।मीरा कृष्ण को स्पष्ट शब्दों में अपना पति स्वीकार करती है-मेरे तो गिरिधर गुपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई।।मीराबाई स्वयं को अचल सुहागिन भी मानती हैं-झुठा सुहाग जगत करही सजनी, होय-होय मिट जासी।मैं तो एक अविनासी वरूँगी, जाहे काल न खासी।।और भी जिसके पिया परदेस बसत है,लिखि-लिखि भेजौ पाती।मेरो पिया मेरे हिय बसत है ना कहुँ आती- जाती।।मीराबाई कृष्ण के अतिरिक्त दूसरे को पुरुष स्वीकार नहीं करती। उच्चकोटि की कृष्णभक्त मीरा के बारे में पं. रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि "जब लोक इन्हें खुले आम मंदिरों में पुरुषों के सामने जाने से मना करते तब वे कहती कि कृष्ण के अतिरिक्त और पुरुष है कौन जिसके सामने लज्जा करूँ?' मीरा अपने प्रियतम को अपने से पृथक ही नहीं मानती। प्रेम की परिधि की पूर्णता संयोग की सुखानुभूति और वियोग के ताप से ही संभव है। मिलन का सुख अपने आप में अपूर्ण और अधूरा होता है। प्रेम-व्यापार में मिलन की स्थिति तो प्रेमासिक्त हृदय की तड़पन का पूर्ण विराम है। प्रेम के संसार का सर्वाधिक उज्ज्वल पक्ष विरह की तड़प होती है, विरह की मर्मांतक पीड़ा होती है, प्रतीक्षा के बिना न बीतने वाले क्षण होते हैं। मीरा की पदावली में निस्संदेह मिलन से अधिक मिलन की उत्कंठा का, प्रियतम से अधिक प्रियतम की प्रतीक्षा का वर्णन मिलता है। मीरा अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में इतनी उन्मादिनी-सी हो गई हैं कि लाज और संकोच का त्याग करके महलों के ऊपर चढ-चढ कर अपने प्रियतम की बाट जोहती है-सुनि हो मैं हरि आवन की आवाज।म्हैलॉं चढ जोऊँ मेरी सजनी, कब आवैं महराज।प्रतीक्षा का एक-एक क्षण "युग' के समान व्यतीत होता है। मीरा ने प्रतीक्षा के इन क्षणों का अत्यंत प्रभावोत्पादक वर्णन किया है जो निःसंदेह मिलन की सुखानुभूति से कहीं अधिक मार्मिक बन पड़ा है। उन्हें तो घर-आँगन कुछ भी नहीं सुहाता। अपने प्रियतम की प्रतीक्षा के दिन गिनते-गिनते उनकी अँगुलियों की रेखाएँ तक घिस गई हैं-"होली पिया बिन लागॉं री खारी।सूनों गॉंव देस सब सूनो, सूनी सेज अटारी।देस-बिदेसणा जावॉं म्हारी अणेशा भारी।गणतॉं-गणतॉं घिस गयॉं रेखॉं, आँगरियॉं री मारीआयाणा मुरारी।'प्रियतम से मिलन की उत्सुकता में प्रेमिका का चैन और निंद कहॉं रह सकते हैं। वह सारी-सारी रात जागती है और अपने प्रियतम की बाट जोहती है-सखी म्हारी नींद नसाणी हो।पिय रो पंथ निहारता सब रैण विहाणी हो।सखियन सब मिल सीख दयॉं मण एक न माणी हो।बिन देख्यॉं कल न पड़ा मन रोसणा ठाणी हो।अंग खीण व्याकुल भ्यॉं मुख पिय-पिय बाणी हो।अंतर वेदन विरह री म्हारी पीड़ णा जाणी हो।ज्यूँ चातक घडकूँ रटै मछरी ज्यूँ पाणी हो।मीरॉं व्याकुल विरहणी, सुध-बुध बिसराणी हो।रहस्यानुभूती का सत्य किसी दार्शनिक सिद्धांत के खंडन या मंडन में विश्वास नहीं रखता। रहस्योन्मुखी धारा के अधीन ईश्वरीय सत्ता ज्ञान की नहीं अपितु अनुभूति का विषय भी बन जाती है और उस दिव्यानुभूति में ज्ञाता और ज्ञेय के मध्य कोई दूरी नहीं रह जाती, एक दूसरी में तादात्य की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। संकोच लोकलाज की मर्यादाएँ एक-एक करके धराशायी होती जाती हैं और फिर ज्ञाता मीरा की भॉंति गा उठता है-म्हारूँ री गिरधर गोपाल, दूसरॉं णॉं कूयॉं
दूसरा णॉं कूयॉं सकल लोक जूयॉं।मैं तो गिरधर के घर जाऊँगिरिधर म्हॉंरो सॉंचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ।मीरा के प्रेमपरक रहस्यवाद में प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम है, प्रेम की पुकार है, पीड़ा है-हे री, मैं तो प्रेम दिवाणी, मेरो दरद न जाणै कोय।घायल की गति घायल जाणै, और न जाणै कोय।सूली ऊपर सेज पिया की, केहि विधि मिलना होय।
दरद की मारी बन-बन डोलूँ, बैद न मिलिया कोय।मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, बैद सॉंवलिया होय।।मीरा श्रीकृष्ण से मिलकर उन्ही में लीन हो जाती हैं-पंचरंग चोला पहर्या सखिम्हॉं, झिरमिट खेलन जाती।वॉं झिरमिट मॉं सॉंवरो, देख्यॉं तन-मन राती।रहस्योन्मुखी भावना की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह अपनी ही प्रत्यक्ष और असंदिग्ध अनुभूति मं विश्वास करती है। अनुभूति का स्वरूप अपने आप में नितांत स्वच्छ और निर्मल होता है। मीरा की स्वानुभूति भी अत्यंत स्वाभाविक और सहज बन पड़ी है और निस्संदेह इसका कारण यह है कि मीरा के पास अपने प्रियतम से पूर्ण तादात्म्य स्थापित करने का अपेक्षातया अधिक अवकाश था। मीरा भी अपने आराध्य के प्रति केवल श्रद्धा का ही भाव नहीं रखती अपितु उसके प्रत्यक्ष ज्ञान का दवा भी करती हैं। उनके आराध्य श्रीकृष्ण अद्वितीय होते हुए भी एक "चिर-परिचित' प्रतीत होते हैं, अनिर्वचनीय होते हुए भी अपने से लगते हैं। मीरा अपने आराध्य के प्रति एक विचित्र भाव रखे हुए हैं जो कि बाह्य रूप से धार्मिक आवरण धारण किए हुए भी मीरा का नितांत व्यक्तिगत भाव प्रतीत होता है। यद्यपि मीरा कई बार अपने प्रियतम को प्रभु, गिरधर नागर, हरि अविनाशी आदि कहकर उनके दिव्य अलौकिक रूप की प्रतिष्ठा करती हैं किंतु उनकी मूल कामना तो वास्तव में यही है कि-म्हॉं गिरधर आगॉं नाच्या री।णाच णाच म्हॉं रसिक रिझवॉं, प्रीत पुरातन ज्यॉंच्यॉं री।स्याम प्रीत रो बॉंधि धुँधरयॉं, मोहन म्हारो सॉंच्यॉं री।लोक-लोक कुलरा मरज्यॉंदॉं, जगमॉं णेक राख्यॉं री।प्रीतम पल छब णा बिसरावॉं, मीरा हरि रंग राच्यॉं री।मीरा अपने प्रियतम के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखती हैं। उनके मनोहर रूप को देखकर, प्रेमोन्मत्त होकर करताल बजा-बजा कर नाच उठती हैं। मीरा का युग हिंदी साहित्य का भक्ति युग था और इस युग मं भी रहस्यवाद की परंपरा बहुत प्राचीन रही है। यद्यपि उपनिषदों की उपासना में भक्ति पर अधिक बल नहीं दिया गया किंतु युग में हिंदी के विभिन्न भक्त- कवियों ने समर्पण और भक्ति द्वारा उस लक्ष्य को प्राप्त करने की सफल चेष्टा की है। मीरा के काव्य में तो समर्पण का भाव ही अधिक है क्योंकि माधुर्य भाव की भक्ति में यही समर्पण सर्वाधिक उपयुक्त रहता है। मीरा के समर्पण की पराकाष्ठा देखते ही बनती है-गिरिधर म्हॉंरों सॉंचों प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ।रैण पड़े तब ही उठि जाऊँ, भोर भये उठि आऊँ।रैण दिना वाके संग खेलूँ, ज्यूँ वाहि रिझाऊँ।जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ।मेरी उणकी प्रीत पुरानी, उण बिण पल न रहाऊँ।जनॉं बैठावें तितही बैठूँ, बेचे तो बिक जाऊँ।मीरॉं के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊँ।यही नहीं, मीरा के गीतों में योगियों की परिभाषिक शब्दावली का भी प्रयोग मिलता है जो कि सगुण भक्त मीरा के "प्रेम के मधुर राग' से मेल नहीं खाता है। मीराबाई पर निर्गुणवादियों का भी प्रभाव पड़ा था, लेकिन वे निर्गुणोपासिक नहीं थीं। मीराबाई के जीवन में व्याप्त केवल एक ही भाव है, एक ही रस है और एक ही रंग है। श्रीकृष्ण भक्ति के अतिरिक्त वे कुछ भी जानना अथवा समझना नहीं चाहती थीं। सूत्र-रूप में वे गिरधारी की अपनी थीं और गिरधारी उनके जीवन-सर्वस्व थे। उनकी भक्ति का आदर्श ब्रज की गोपियॉं थीं और उनका प्रेम भी गोपी-भाव से संबद्ध था। प्रसिद्ध है कि "ललिता' का अवतार मीराबाई के रूप में हुआ था। अत: विह्वलता, विषाद और वेदना की निष्कपट अभिव्यक्ति मीरा के पदों की विशेषता है।निष्कर्षत : कहा जा सकता है कि मिरा की पदावली में लौकिकता से विमुख होकर मीरा अपने गिरधारीलाल के प्रति उत्सुकता, विस्मय, जिज्ञासा, लालसा एवं मिलनानुभाव के भाव प्रकट करती हैं। यह एक प्रकार की दिव्यानुभूति है क्योंकि इसका संबंध अलोलिक शक्ति से होता है। तथापि मीरा की इस रहस्योन्मुखी भावना की भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता यही है कि प्रेम का सूत्र, किसी न किसी रूप में सर्वत्र आच्छादित रहता है। मीरा की यह प्रेम-भावना, सहस्यवादी दृष्टि के स्पर्श से और अधिक घनीभूत हो गई है। मीरा का यह प्रेम-भाव व्यापक तो अधिक नहीं है किंतु तीव्र बहुत है। प्रेम का इतना उन्मुख विलास संभवत: हिंदी के अन्य कवियों में दुर्लभ ही होगा।


राधा-कृष्ण के पारलौकिक प्रेम को उकेरने में पद्मश्री चित्रकार कृष्ण कन्हाई व गोविन्द कन्हाई ने ब्रज स्वर्ण चित्र शैली (कन्हाई चित्र शैली) द्वारा बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इसमें इन दोनों ने अपनी प्रतिभा से चित्रकला को जो आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया है, वह स्तुत्य है। ये चित्रकार चित्रों को बनाने के बाद उन्हें सोने के वर्क व सरोस्की (आस्ट्रिया) के मशीन कट नगीनों से जड़ते हैं, जिससे कि उनके चित्रों का सौंदर्य हज़ारों गुना बढ जाता है। कन्हाई परिवार अब तक बीस हजार से अधिक तैल चित्र बना चुका है। इनकी चित्रकला इतनी भावदर्शी है कि उसमें हरेक व्यक्ति खो जाता है। ये चित्रकार द्वय दिल्ली से १४० कि.मी. दूर "वृंदावन' में विराजते हैं। यहां इनकी वृहद् व अति सुंदर निजी चित्र वीथिका भी है, जिसका अवलोकन देश-विदेश के असंख्य नामी-गिरामी व्यक्ति कर चुकें हैं।

भारत में सवर्ण चित्रों का इतिहास अत्यंत पुराना है। बारहवीं सदी के जैन कला सूत्र पांडुलिपियों में सोने की स्याही से बने चित्र में अंकित हैं। कालांतर में चित्रों की चमक बढाने के उद्देश्य से स्वर्ण पत्तरों व नगों का भी प्रयोग होने लगा साथ ही इससे मिनिएचर पेंटिंग्स भी बनने लगी। बाद में यह कला दक्षिण भारत तक जा पहुंची और वहां "तंजोर स्कूल ऑफ पेंटिंग्स' के नाम से मशहूर हुई। ब्रिटिश काल में उत्तर भारत में यह कला लुप्तप्राय हो गयी। आजादी के चार-पांच वर्ष बाद कृष्ण कन्हाई व गोविन्द कन्हाई के पिता पद्मश्री कन्हाई चित्रकार ने इस कला में एक विशेष शैली विकसित कर उसे पुनर्जीवित किया, जो कि अब "कन्हाई स्कूल ऑफ पेंटिंग्स' के नाम से प्रसिद्ध है।पद्मश्री कृष्ण कन्हाई व गोविन्द कन्हाई को चित्रकारी करने की प्रेरणा अपने पिताश्री से विरासत में मिली। रंगों, सोने एवं नगों का काम होने के कारण इनकी चित्रकला त्रिआयामी है। इनके चित्रों में शोख रंगों का प्रयोग अधिक हुआ है। साथ ही वे इतने बहुमूल्य हैं कि उन्हें घर में रखा जाना "स्टेटस-सिंबल' माना जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण चित्रकार कृष्ण व गोविन्द के न केवल आराध्य अपितु उनके जीवन के प्रेरणा स्रोत भी हैं। इन दोनों का पूरा ही परिवार भगवान श्रीकृष्ण के रंग में रचा-बसा है। भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से उनके परिवार में पिछले लगभग पचास वर्षों से कला की साधना हो रही है।पद्मश्री कृष्ण कन्हाई व गोविन्द कन्हाई हरेक कला में संस्कृति के प्रबल पक्षधर व अत्यंत हिमायती हैं। इन दोनों का कहना है कि कलाएँ ही संस्कृति को जीवित रखती हैं। वे कहते हैं कि कला आत्मा के स्वरूप का प्रक्षेपण हैं अतएव कलाकार को कई चुनौतियों से रूबरू होना पड़ता है। वे कला व ईश्वर को एक-दूसरे का पर्याय मानते हैं। इनका कहना है कि कला ईश्वर प्राप्ति का सहज साधन है। कला ईश्वर की ही साधना है, जैसे ईश्वर विराट है, वैसे ही कला भी। इन दोनों का यह भी कहना है कि आज के युग में मनुष्यता जिस तीव्र गति से तिरोहित होती जा रही है, उसका मूल कारण कला विमुखता ही है।

पारंपारिक चित्रकला के कृष्णमय चितेरे कृष्ण कन्हाई व गोविन्द कन्हाई ने अपनी प्रतिभा से चित्रकला को नित नये आयाम दिये हैं। कृष्ण चित्रकला में माहिर हैं तो गोविन्द भाव उकेरने में । गोविन्द के द्वारा चित्रों में की गयी "एंबोसिंग' देखते ही बनती है। वस्तुतः वे इस फन के बेमिसाल उस्ताद हैं। पद्मश्री कृष्ण व गोविन्द कन्हाई "पोट्रेट' बनाने के क्षेत्र में भी इन दिनों सारी दुनिया में खूब नाम कमा रहे हैं। वस्तुतः ये दोनों इस हुनर में इन दिनों अव्वल नंबर पर हैं। इन दानों ने इस कार्य को आज से लगभग २५ वर्ष पूर्व अपने एक दिवंगत मित्र का "पोट्रेट' बनाकर प्रारंभ किया था। बाद में अनगिनत लोगों के "पोट्रेट' बनाए। इन दोनों को "पोट्रेट' बनाने की प्रेरणा अपने पिताश्री से मिली है। दोनों चित्रकार श्रेष्ठ "पोट्रेट' उसे मानते है, जिसमें असली-नकली का भेद करना मुश्किल हो। ये बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को उनका आदमकद "पोट्रेट' भेंट करने के लगभग तीन माह बाद जब उनसे लोगों की प्रतिक्रिया पूछी तो वे यह बोले कि लोग कहते हैं कि यह कहना मुश्किल है कि असली कौन है। वस्तुत: यह आपके हाथो का ही कमाल है।पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सन् २००० में जब अपनी अमेरिका यात्रा पर गये तो वे तब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को भेंट करने के लिए उनका व उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन का जो "पोट्रेट' ले गये थे, उसे कृष्ण व गोविन्द ने ही बनाये थे। इस "पोट्रेट' को देखकर बिल क्लिंटन अभिभूत हो गये थे। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी इनके द्वारा बनाया गया अपना "पोट्रेट' देखकर अवाक रह गये। बाद में उन्होंने इन चित्रकार-द्वय से कहा कि प्रभु की आप पर अनंत व अपार कृपा है। मैं अपना "पोट्रेट' चाहे जितना देखूं पर मुझे उससे तृप्ति नहीं होती।कृष्ण व गोविन्द को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टैक्नोलॉजी (निफ्ट) के दिल्ली स्थित सिरी फोर्ट ओडीटॉरियम में हुए फैशन शो में सिल्क व रेक्सीन के वस्त्रों पर राधाकृष्ण व उनसे संबंधि विभिन्न विषयों पर चित्रकारी करने के लिए "बेस्ट कास्ट्यूम' का पुरस्कार भी मिला है। इसके अलावा ये दोनों सहोदर कला के क्षेत्र में अपने विशिष्ट व उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा "नेशनल यूनिटी आवार्ड' एवं "एचीवर्स ऑफ मिलेनियम अवार्ड' प्राप्त कर चुकें हैं। सन् २००४ में चित्रकार कृष्ण कन्हाई को भारत के राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा था। चित्रकार कृष्ण कन्हाई के पिता कन्हाई चित्रकार को भी भारत सरकार ने सन् २००० में "पद्मश्री' पुरस्कार प्रदान किया था। भारत सरकार से एक ही क्षेत्र में पिता व पुत्र को अलग-अलग पद्म सम्मान प्राप्त करने का गौरव संभवत: अपने देश में केवल कन्हाई परिवार को ही है। वृंदावन में जन्म लेने और यहां की माटी में विकसित होने के कारण कृष्ण कन्हाई की चित्रकला में ब्रज संस्कृति की सुघड़ छाप है। उन्होंने पारंपरिक चित्रकला के अलावा जो आधुनिक चित्रकारी की है, वह सब की सब ब्रज के सुंदर नि:सर्ग से संबंधित है। उनके तैल चित्रों में ब्रज संस्कृति, प्राकृतिक दृश्यों, पेड-पौधों, पक्षियों, जलचरों, झरने-पोखरों, मंदिरों और घाटों आदि का सुंदर अंकन देखने को मिलता है। इनके द्वारा उकेरे गये चित्रों में छया व प्रकाश की आकर्षण योजना, रेखाओं की चपल गति, रंगों की सुचारु संगत और भाव दर्शन के तमाम समृद्ध आयाम दृष्टिगोचर होते हैं। यही कारण है कि उनकी पेंटिंग्स सजीव जान पड़ती हैं।कृष्ण कन्हाई ने पारंपरिक चित्र शैली के साथ-साथ यथार्थवादी चित्र शैली को भी अपनाया है। उन्होंने तमान "मॉडर्न' व "एब्सट्रैक्ट' पेंटिंग्स भी बनाई हैं। उनके सुपुत्र सिद्धार्थ कन्हाई की भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से बैचलर ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट की त्रिवर्षीय ड़िग्री प्राप्त करने के बाद अपने परिवार से विरासत में मिली कला की साधना में रत हैं। ब्रज संस्कृति की परम कलाकृतियॉं बनाने में इनका विशेष रूझान है।कन्हाई परिवार के चित्र-संसार को देख हरेक उसमें खो जाता है। ये सभी चित्रकला में कला-पक्ष के अलावा भाव-पक्ष पर भी विशेष ध्यान देते हैं। इनके चित्रों की सबसे बडी विशेषता है- भावों की सूक्ष्म पकड़।इस चित्रकार परिवार ने अपने सभी चित्र काल्पनिक व यथार्थ दृष्टि में बेहद संतुलन रख कर बनाए हैं इसीलिए इन चित्रकारों की कला में सत्यम् शिवम् सुंदसम् की झलक है और वे शाश्वत व कालजयी हैं। इन चित्रकारों की यह आकांक्षा है कि चित्र बनाते-बनाते न कभी उनका तन थके और न कभी उनका मन। ये सभी यह भी चाहते हैं कि उन्हें राधा-कृष्ण के चित्र बनाते-बनाते उनके साक्षात् दर्शन हो जाएं। ये दोनों उनके सामने आकर बैठ जाएं और वे उनकी हूबहू तस्वीर बनाएं। इन चित्रकारों का यह भी कहना है कि वे अपनी हरेक पेंटिंग अपने सुकून के लिए बनाते हैं। वे अपनी कलाकृतियों से भावनात्मक रूप से इतना अधिक जुड़े हुए हैं कि वे उन्हें किसी भी कीमत पर बेचना नहीं चाहते। यदि उनका बस चले तो वे अपनी एक भी कलाकृति न बेचें। किंतु अपने प्रशंसकों व कला-प्रेमियों की जबरदस्ती मांग के कारण उन्हें अपने चित्रों को बेचना पड़ता है। कन्हाई परिवार के रचना संसार पर आगरा के डॉ. भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय व दयाल बाग डीम्ड विश्वविद्यालय में शोध कार्य भी हो चुका है।कन्हाई परिवार द्वारा बनाए गये चित्र देश-विदेश में असंख्य कला-प्रेमियों के निवास स्थानों व महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवनों में लगे हुए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, पूर्व उपप्रधामंत्री लालकृष्ण आड़वानी, फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, संजय दत्त, जयाप्रदा, हेमामालिनी, प्रख्यात उद्योगपति सुब्रत राय, अनिल अंबानी, लक्ष्मी मित्तल, यश बिड़ला, सांसद अमर सिंह आदि अनेकानेक महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के घरों में कन्हाई परिवार द्वारा बनाई गयी कलाकृतियों संगृहीत हैं।यह चित्रकार परिवार ह्यूस्टन (अमेरिका) के जार्ज आर. ब्राउन कन्वेन्शन सेंटर, हांगकांग के होटल होलीडे इन व मनीला के हिंदू मंदिर के अलावा अपने देश के राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास, इंडिया हेबिटेट सेंटर, कोलकाता की बिड़ला अकादमी व मुंबई के नेहरू सेंटर आदि में अपनी कलाकृतियों को प्रदर्शनियां लगा चुका है। मुंबई में इनकी चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन व सांसद अमर सिंह ने किया था।

गोपाल चतुर्वेदी


मिर्जा असद्दुल्लाह गालिब का जन्म आगरा में २७ दिसम्बर १७९७ में हुआ था और ७२ साल की लम्बी उम्र गुजार कर १५ फरवरी १८६९ को इस मशहूर लेकिन निराश शायर ने दिल्ली में दम तोड़ा। पतझड़ में दरख्तों से टूट-टूट कर गिरते पत्तों की मानिंद मुगल काल के अन्त का गवाह रहा यह अजीम शायर अंग्रेजी हुकूमत और सन् १८५७ के गदर का चश्मदीद रहा। गालिब की शायरी से यह तो स्पष्ट है कि सन् सत्तावन के गदर और लुटी हुई दिल्ली में हुए कत्लों-ग़ारत से वह बेहद दु:खी थे, मगर उनका यह दु:ख उनकी कलम के जरिये किसी ज्वाला में तब्दील न हो सका। हुस्नो-इश्क, गरीबी और मयकशी पर हज़ारों अशआर कहने वाले गालिब पर यह आरोप लगते रहे कि आर्थिक कारणों के चलते अंग्रेजी हुकूमत और हिंदुस्तानियों पर हो रहे जुल्मों की खिलाफत में उन्होंने कभी खुल कर कुछ नहीं लिखा। जबकि उनकी शायरी में वह ताकत थी जो अगर क्रान्तिकारियों के सुर से मिल जाती तो सत्तावन के गदर की आग ज्वालामुखी का रूप इख्तियार कर लेती। हालांकि गदर का दर्द गालिब के कुछ अशआरों में जरूर मिलता है और उनके खुतूत उनके दु:ख की तस्वीर पेश करते हैं। अपने खुतूत में खुद गालिब ने माना कि स्वतंत्रता, त्याग और उदारता के जो जौहर उनको मिले थे, वह प्रकट न हो सके। खुद को खुदा का कोपभाजन, बहिष्कृत, बुढ़ा, दुर्बल, बीमार, फकीर, दरिद्रता में गिरफ्तार बताते हुए गालिब ने अपने एक खत में लिखा है-"वह जो किसी को भीख मांगते न देख सके और खुद दर-ब-दर भीख मांगे, वह मै हूं।'जुलाई १९५८ में जब मशहूर शायर अली सरदार जाफरी ने बम्बई में "दीवान-ए-गालिब' की भूमिका लिखनी शुरू की तो एक समालोचक की दृष्टि से "गदर और गालिब' के सम्बन्ध में उनकी तमान ग़जलों-अशआरों का पोस्टमार्टम करते हुए उन्होंने लिखा कि गालिब के पास सामाजिक प्रगति का एक उत्तम विचार मौजूद था और निर्माण की अभिलाषा उनके दिल का सबसे बड़ा दर्द। बहरहाल, गालिब ने अपने पत्रों में गदर की तबाही के बाद दिल्ली के जो हृदय-विदारक मर्सिये लिखे हैं, उनमें एक जगह यह "हसरत-ए-तामीर' यानी "निर्माण की अभिलाषा' का शेर भी लिखा हुआ नजर आता है- "दिल्ली का हाल तो यह है-घर में था क्या कि तिरा गम उसे ग़ारत करतावो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर सो है
इन दो पंक्तियों के पीछे गालिब के विचारों की एक दुनिया आबाद है। १८५७ की क्रांति से बहुत पहले गालिब ने यह अनुमान कर लिया था कि मुगल संस्कृति और समाज का दीप अब सदा के लिए बुझने वाला है। यद्यपि इसकी प्राचीन मान्यताएं गालिब को बहुत प्रिय थीं, लेकिन उन्हें यह भी ज्ञात था कि इमारत अब बेबुनियाद हो चूकी है जड़ें खोखली। हवा का कोई भी झोंका उसे गिरा सकता है।सरदार जाफरी ने आगे लिखा, "गालिब ने उस नयी दुनिया की झलक देख ली थी जो विज्ञान और उद्योग की प्रगति के साथ आ रही थी, लेकिन अफसोस ! कि वह अंग्रेजी पूंजीवाद की शोषण-शक्ति का अनुमान न लगा सका और यदि लगाया हो तो उसका सबूत नहीं मिलता।'लेकिन अंग्रेजों के लाये हुए विज्ञान और उद्योग से गालिब इतने प्रभावित थे कि जब गदर से कई वर्ष पहले सर सैयद अहमद खां ने अबुल फ़ज्ल की "आईना-ए-अकबरी' का परिशोधन किया और गालिब से उसकी समीक्षा लिखने को कहा तो गालिब ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "आंखें खोलकर साहिबान-ए-इंग्लिस्तान को देखो कि ये अपने कला-कौशल में कितने आगे बढ़ गये हैं। उन्होंने हवा और लहरों को बेकार करके आग और धुएं की शक्ति से अपनी नावें सागर में तैरा दी हैं। यह बिना मिजराब के संगीत उत्पन्न कर रहे हैं और उनके जादू से शब्द चिड़ियों की तरह उड़ते हैं, हवा में आग लग जाती है और फिर बिना दीप के नगर आलोकित हो जाते हैं। इस विधान के आगे बाकी सारे विधान जीर्ण हो चुकें हैं। जब मोतियों का खजाना सामने हो तो पुराने खलियानों से दाने चुनने की क्या आवश्यकता है ?'यह कथन सोचने को मजबूर करता है कि क्या अंग्रेजी चमक आर्थिक रूप से तंगहाल गालिब की सोच पर हावी हो चली थी ? या यह उनकी प्रगतिवादी या उदारवादी सोच थी कि उन्होंने कहा, "आईना-ए-अकबरी के अच्छा होने में क्या संदेह है, लेकिन उदार सृष्टि को कृपण नहीं समझना चाहिए क्योंकि गुणों का अन्त नहीं है। खूब से खूबतर का क्रम जारी रहता है।' (फारसी मसनवी नं १०)इस बात में कोई संदेह नहीं कि गालिब अकबर-कालीन विधान की तुलना में नये औद्योगिक विधान को प्रधानता देते थे। वह विज्ञान के आविष्कारों और विचारों को शायरी में स्थान देने के पक्ष में थे (खुतूत-मेहर ५४८)। अली सरदार जाफरी लिखते हैं कि गालिब के लिए यह अनुमान लगाना कठिन था कि इस नयी व्यवस्था के सामाजिक सम्बन्ध क्या हैं और इसकी प्रकृति में किस प्रकार की विनाशकता है। लेकिन उनका एक शेर ऐसा जरूर है जो एक क्षण के लिए चौंका देता है-ग़ारतगर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-जर
क्यों शाहिद-ए-गुल बाग से बाजार में आवेयह अनुभव कर लेना कठिन नहीं है कि गालिब अपने युग से अत्यन्त निराश थे। इस निराशा में निजी असमर्थताओं और सामाजिक विवशताओं ने मिलकर एक कैफियत पैदा कर दी थी। गालिब की दिल्ली उनकी आखों के सामने उजडी, बंधु-बांधव आंखों के सामने कत्ल हुए, समकालीन कवि और विद्वान फांसियों पर चढ़ा दिये गये या काले पानी भेज दिये गये और गालिब के लिए "मातम-ए-यक शहर-ए-आरज़ू' यानी कामना नगरी के शोक के अतिरिक्त कुछ बाकी नहीं रह गया-अब मैं हूं और मातम-ए-यक शहर-ए-आरज़ूतोड़ा जो तूने आईना, तिभसाल दार थाइन हालातों में वह यही कहने पर विवश थे-
न गुल-ए-नग़्मा हूं पर्द-ए-साज
मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज
१५ फरवरी, १८६९ के रोज दिल्ली में मरते समय भी यह कटु अनुभूति चेहरे पर साफ झलक रही थी।

- नसीम अंसारी


साहित्य और कला का सामाजिक उद्देश्य

भारत जैसे देश में जहां बड़े पैमाने पर लोग गरीबी तथा अन्यभयावह स्थितियों में रहते हैं केवल कला के लिए कला पलायन है

भारत की वर्तमान सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को देखते हुए कला और साहित्य की भूमिका आज के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। मोटे तौर पर कला और साहित्य के बारे में दो सिद्धांत हैं : "कला, कला के लिए'। और "कला, सामाजिक उद्देश्य के लिए'। पहले सिद्धांत के मुताबिक, कला और साहित्य का उद्देश्य लोगों तथा स्वयं कलाकारों की खुशी और मनोरंजन के लिए खूबसूरत या अद्भुत कृति बनाना है। यदि उसे सामाजिक विचारों के प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो वह कला नहीं रहती, प्रचार (प्रोपेगेंडा) हो जाती है। इस मत के समर्थकों में अंग्रेजी साहित्य में कीट्स, टेनिसन, टी. एस. इलियट और एजरा पाउंड, अमेरिकी साहित्य में एडगर एलन पू, हिंदी में अज्ञेय और रीतिकाल तथा छायावाद के कवि, उर्दू में जिगर मुरादाबादी और बंगाली साहित्य में रवींद्रनाथ टैगोर जैसे साहित्यकार हैं।दूसरा सिद्धांत कहता है कि कला और साहित्य को लोगों को दमन तथा अन्याय के खिलाफ जागरूक करते हुए और इन मुद्दों के प्रति उनकी संवेदन शीलता बढ़ाते हुए जन सेवा करनी चाहिए। इस विचारधारा में अंग्रेजी साहित्य में डिकेंस और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, अमेरिकी साहित्य में वाल्ट व्हिटमैन, अप्टॉन सिनक्लेयर और जॉन स्टेनबेक, फ्रेंच में बालजाक, विक्टर ह्यूगो और फ्लूबर्ट, जर्मन में गोथे और शिलर, स्पेनिश में करवेंटिस, रूसी में ऑल्सटॉय, दोस्तोएव्स्की आर गोर्की, हिंदी में प्रेमचंद और कबीर, बंगाली में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय तथा काजी नजरूल इस्लाम और उर्दू में फैज, जोश तथा मंटो शामिल हैं।देश की समस्याओं को देखते हुए, भारतीय कलाकारों और लेखकों को आज इनमें से किस विचारधारा का अनुसरण करना चाहिए ?इसका उत्तर देने से पहले, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन दोनों विचारधाराओं ने महान कलाकार और लेखक दिए हैं। उदाहरण के लिए, शेक्सपीअर और कालिदास को मोटे तौर पर "कला, कला के लिए' वाली विचारधारा का नाटककार माना जा सकता है। उनके नाटक मनोरंजन और मानवीय आवेगों तथा प्रेरणाओं की समझ के आगे कोई सामाजिक उद्देश्य नहीं रखते। शेक्सपीयर समाज को सुधारने या सामाजिक बुराइयों से लड़ने का कोई प्रयास नहीं करते। फिर भी मानव मनोविज्ञान का उनका चित्रण और कार्य के उद्देश्य अद्भुत हैं। चाहे वह हैमलेट हो, मैकबेथ, किंग लीयर, फालस्टाफ, जेलियस-सीजर या इयेगो- ये चरित्र इतने जीवंत हैं कि बाद की हर पीढ़ी ने उनमें मानव प्रकृति का अपना अनुभव देखा है। इसी प्रकार, कालिदास का मेघदूतम प्रकृति और प्रेम काव्य का चरम है। उत्तर भारतीय देहात का उनका चित्रण सौंदर्य में अद्भुत है। हालांकि उनकी कृतियों में कोई सामाजिक उद्देश्य नहीं है।दूसरी ओर, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के नाटक सामाजिक अन्यायों का एक सशक्त चित्रण हैं और चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास इंग्लैंड के स्कूलों, जेलों, अनाथालयों न्यायिक व्यवस्था की भयावह परिस्थितियों पर प्रहार करते नजर आते हैं।आलोचक अक्सर कला तथा साहित्य के दो मूलभूत रुझानों को यथार्थवाद और रोमनियत के रूप में देखते हैं। लोगों और उनकी सामाजिक परिस्थितियों के सच्चे, सीधे वर्णन को यथार्थवाद कहा जाता है जबकि रोमानियत में कल्पना, आवेग ओर भावनात्मक उद्वेगों पर जोर होता है।यथार्थवाद और रोमनियत निष्क्रिय भी हो सकते हैं और सक्रिय भी। निष्क्रिय यथार्थवाद सामान्यत: बिना किसी उपदेश के वास्तविकता का सच्चा चित्रण होता है, जैसा कि जेन ऑस्टेन, जॉर्ज इलियट या ब्रोंट सिस्टर्स के उपन्यासों में देखा जाता है। कभी-कभी निष्क्रिय यथार्थवाद उत्पीड़न और सामाजिक बुराइयों का प्रतिरोध न करते हुए भाग्यवाद, निष्क्रियता पर जोर देता है। इसका एक उदाहरण टॉल्सटॉय के वार एंड पीस (युद्ध और शांति) का दब्बू किसान प्लेटन करातयेव है जो चुपचाप अपने भाग्य को स्वीकार कर लेता है या थॉमस हार्डी के निराशवादी उपन्यास (टेस, जूड़ द ऑब्सक्योंर)।डिकेंस, विक्टर ह्यूगो, मैक्सिम गोर्की, शरतचंद्र सक्रिय यथार्थवादियों की विचारधारा में सम्मिलित हैं। वे निष्क्रियता का विरोध करते हैं और लोगों को सामाजिक बुराइयों से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, शरतचंद्र के उपन्यासों (श्रीकांत, ब्राह्मण की बेटी, ग्रामीण समाज) में हम जाति व्यवस्था की अमानवीयताओं के खिलाफ सशक्त आवाज पाते हैं।निष्क्रिय यथार्थवाद की ताकत मानवीय उद्देश्यों और सामाजिक बुराइयों के उद्घाटन में निहित है लेकिन सकारात्मक सिद्धांतों के अभाव में उसकी कमजोरी निहित है। ऐसा साहित्य स्पष्ट और वास्तविक के उचित वर्णन के लिए कीमती था लेकिन उसने लोगों को उससे निकलने की कोई राह नहीं दिखाई और उसने अक्सर व्यक्ति को अपने वातावरण के केवल एक निष्क्रिय उत्पाद के रूप में देखा जो असहाय और अपनी सामाजिक स्थितियों को बदलने में असमर्थ होता है।निष्क्रिय और सक्रिय यथार्थवाद, दोनों सामाजिक उद्देश्य पूर्ण कर सकते हैं लेकिन जहां निष्क्रिय यथार्थवाद अक्सर भाग्यवाद, निराशावाद और समाज को सुधारने में मानव प्रयासों की व्यर्थता को दिखलाता है, वहीं सक्रिय यथार्थवाद आशावादी होता है और उसमें लोगों के लिए चिंता होती है। यह आम आदमी को अपनी दुर्दशा के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करता है।अक्सर ठीक-ठीक यह बताना कठिन होता है कि शेक्सपियर, बालजाक, टॉल्सटॉय या मिर्जा गालिब जैसे महान लेखक रोमानी हैं या यथार्थवादी। उनकी कृतियों में दोनों रुझान मिले होते हैं। वास्तव में, सबसे महान कला अक्सर इन दोनों का मिश्रण होती है।यथार्थवाद की तरह रोमानियत भी निष्क्रिय या सक्रिय, दोनों में से कोई भी हो सकती है। निष्क्रिय रोमानियत "जीवन की अनिवार्य पहेली' या प्रेम और मृत्यु के सपनों के विचारों के साथ लोगों को वास्तविकता से पूरी तरह कल्पना या भ्रम की दुनिया की और मोड़ने का प्रयास करती है या व्यक्ति के अंतर्मन के साथ एक निरर्थक व्यस्तता दर्शाती है। इसके चरित्र नाइट, राजकुमार, दैत्य या परियां हो सकती हैं जिनका अस्तित्व कल्पना की दुनिया (हिंदी लेखक देवकी नंदन खत्री के उपन्यासों की तरह) में होता है। रीतिकाल का अधिकांश काव्य, जो मुख्य रूप से राजाओं और राजकुमारों को खुश करने के लिए लिखा गया था, इसी श्रेणी के अंतर्गत आता है। इस प्रकार निष्क्रिय रोमानियत शायद ही किसी सामाजिक उद्देश्य को पूर्ण करती है।सक्रिय रोमानियत व्यक्ति को समाज की बुराइयों के खिलाफ उठने के लिए प्रेरित करती है जैसे शेली का प्रोमेथ्यूज अनबाउंड, हेन का एनफैंटा पेर्दू, गोर्की का सांग ऑफ द स्टॉर्मी पीट्रेल ओर महान उर्दू लेखक फैज की कविताएं। इस प्रकार वह एक सामाजिक उद्देश्य पूरा करती है। सक्रिय रोमानियत यथार्थ को उपेक्षित करते हुए नहीं बल्कि सुधारने का प्रयास करते हुए उसे ऊपर उठता है।"सामाजिक उद्देश्य के लिए कला' को अप्रत्यक्ष रूप से भी, उदाहरण के लिए व्यंग के द्वारा भी अभिव्यक्त किया जा सकता है, जैसे स्विफ्ट का गुलीवर ट्रैवलस, लुइस कैरोल का एलिस इन वंडरलैंड, करवेंटिस का डॉन क्विक्जोट और वॉल्टेयर का कैंडाइड। मीर, गालिब और फैज भी अप्रत्यक्ष रूप में दमनकारी सामाजिक रीतियों पर प्रहार करते हैं। यह धार्मिक रूप में, जैसे हिंदी की भक्ति कविता, उदाहरण के लिए कबीर की कविताओं के रूप में भी हो सकता है।हम उस प्रश्न पर लौटते हैं जो पहले रखा जा चुका है। क्या भारत के लेखकों को "कला, कला के लिए' वाली विचारधारा का अनुसरण करना चाहिए या "कला, सामाजिक उद्देश्य के लिए' का ? आज कौन सी विचारधारा हमें अधिक लाभ देगी?मेरी राय में, भारत केवल "कला, सामाजिक उद्देश्य के लिए' वाली विचारधारा ही स्वीकार्य है। हमारा देश गरीबी, बेरोजगारी, अज्ञानता, जातिवाद, सांप्रदायिकता और अन्य सामाजिक बुराइयों को मिटाने की चुनौतियों से जूझ रहा है और लेखकों को एक बेहतर भारत के लिए दमन तथा अन्याय के खिलाफ लड़ रहे लोगों में शामिल होना चाहिए तथा अपनी कला से लोगों को प्रेरित करना चाहिए।बहरहाल, हमारे सामने अंधकारमय और निराशाजनक परिदृश्य है। सच्चाई यह है कि आज शायद की कोई अच्छी कला और साहित्य देखने को मिलता हैं। आज के शरतचंद्र प्रेमचंद या फैज कहां हैं ? कहां हैं कबीर और डिकेंस ? आज साहित्य के क्षेत्र में एक शून्य देखने को मिलता है। लेखक जनता की दुर्दशा का वर्णन करने में रूचि नहीं रखते बल्कि कुछ पैसे कमाने के लिए फिल्मों या टेलीविजन के लिए लिखना चाहते हैं।कुछ हिंदी लेखक शिकायत करते हैं कि हिंदी की पत्रिकाएं बंद हो रही हैं। स्पष्ट रूप से वे जो लिख रहे हैं, उसे कोई नहीं पढ़ना चाहता क्योंकि वे लोगों की पीड़ा का वर्णन नहीं करते, न बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करने को लोगों को प्रेरित करते हैं। जब भी गोर्की सड़क पर उतरते थे, प्रशंसकों की भीड़ उन्हें घेर लेती थी क्योंकि वह उनके जीवन के बारे में लिखते थे। और उनके हित को आगे बढ़ाते थे। क्या कोई हिंदी लेखक ऐसा करने का दावा कर सकता है ?आज भारतीय अच्छे साहित्य के लिए तरस रहे हैं। यदि कोई लोगों के समाने आने वाली वास्तविक समस्याओं के बारे में लिखता है तो उसकी पुस्तक को अपार सफलता मिलेगी। कला और साहित्य को लोगों की सेवा करनी चाहिए। इंग्लैंड में डिकेंस और शॉ, फ्रांस में रूसो और वॉल्टेयर, अमेरिका में थॉमस पेन ऑर वाल्ट व्हिटमैन और बंगाल में शरतचंद्र तथा नजरूल इस्लाम की तरह उन्हें लोगों को अन्याय से मुक्त दुनिया बनाने के लिए एक बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देनी चाहिए।"कला, सामाजिक उद्देश्य के लिए' हाल की उत्पत्ति है। औद्योगिक क्रांति से पहले यह विचार दुर्लभ था कि लोग अपने ही प्रयासों द्वारा अपनी सामाजिक स्थितियों को सुधार सकते हैं। तब तक यह माना जाता था कि अस्तित्व की वर्तमान या भावी परिस्थितियां ईश्वर द्वारा निर्धारित होती हैं जिसमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं होती।अब जबकि वास्तविक अर्थों में वैज्ञानिक युग का आगमन हुआ है और व्यक्ति अपने ही प्रयासों से अपनी सामाजिक स्थिति बदल सकता है तो कला और साहित्य को भी इसमें मदद करनी चाहिए। भारत जैसे देशों में जहां बड़े पैमाने पर लोग गरीबी और अन्य भयावह स्थितियों में रहते हैं, "केवल कला के लिए कला' वास्तव में पलयानवाद है।

- मार्कंडेय काटजू(लेखक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश है।)


 

 

 

 

 

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